हनूज़ आवारा-ए-लैला है जान-ए-रफ़्ता मजनूँ की — मीर तक़ी मीर
हनूज़ आवारा-ए-लैला है जान-ए-रफ़्ता मजनूँ की
मूए पर भी रहा होता नहीं वाबस्ता उल्फ़त का
“The life of Majnun, who is a wanderer of Layla, has no lasting attachment of love even to the lips.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
मजनूँ की दिवंगत आत्मा अभी भी लैला के लिए भटकती रहती है। प्रेम का जुड़ाव एक बाल पर भी टिका नहीं रहता।
विस्तार
यह शेर बिछड़ने के दर्द को बड़ी गहराई से बयां करता है। शायर कहते हैं कि महबूबा अभी भी आवारा है, अपनी ज़िंदगी जी रही है। लेकिन असली बात तो दूसरी पंक्ति में है—इश्क़ का ज़िक्र, उसकी महक, वह होंठों पर भी नहीं रह पाई! यह विरह की वो हालत है, जहाँ यादें भी धुंधली पड़ जाती हैं।
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