निगाह-ए-यास भी इस सैद-ए-अफ़्गन पर ग़नीमत है — मीर तक़ी मीर

निगाह-ए-यास भी इस सैद-ए-अफ़्गन पर ग़नीमत है निहायत तंग है ऐ सैद-ए-बिस्मिल वक़्त फ़ुर्सत का

“Even the glance of despair is a blessing upon this Syed of Afghan; so much is the Syed of Bismil in need of leisure time.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

निगाह-ए-यास भी इस सैद-ए-अफ़ग़न पर ग़नीमत है, और निहायत तंग है ऐ सैद-ए-बिस्मिल वक़्त फ़ुर्सत का। (अर्थ: अफगान के इस सैयद पर निराशा की नज़र भी एक नेमत है, जबकि बिस्मिल के सैयद को बहुत समय की फुर्सत की ज़रूरत है।)

विस्तार

यह शेर एक कड़वी हँसी से भरा हुआ है। शायर, मिर्ज़ा तक़ी मीर, एक शख़्स को संबोधित करते हुए कहते हैं कि निराशा की नज़रों में भी एक तरह की नेमत है। और फिर वो एक ज़बरदस्त तंज़ करते हुए कहते हैं कि ये इंसान इतना व्यस्त है कि इसे वक़्त या फ़ुर्सत ही नहीं मिलती। यह उन लोगों पर एक तीखा तंज़ है जो हमेशा इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी की बात सुनने या किसी के लिए समय निकालना उनके बस में नहीं होता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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