ग़ज़ल

रफ़्तार-ओ-तौर-ओ-तर्ज़-ओ-रविश का ये ढब है क्या

रफ़्तार-ओ-तौर-ओ-तर्ज़-ओ-रविश का ये ढब है क्या

यह ग़ज़ल एक ऐसे रिश्ते पर सवाल उठाती है जहाँ पहले की सहजता और निश्छलता खो गई है। शायर शिकायत करते हैं कि महबूब ने उनके प्रति अपने व्यवहार, अंदाज़ और नज़ाकत में बदलाव किया है, जिससे उनका सम्मान और प्रेम दोनों ही फीके पड़ गए हैं। यह प्रेम में आए बदलाव और बेरुख़ी के दर्द को बयां करती है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
रफ़्तार-ओ-तौर-ओ-तर्ज़-ओ-रविश का ये ढब है क्या पहले सुलूक ऐसे ही तेरे थे अब है क्या
रफ़्तार, ढंग, अंदाज़ और नज़ाकत का ये कैसा सैलाब है? क्या पहले तुम्हारे व्यवहार ऐसे ही थे, या अब कुछ बदल गया है?
2
हम दिल-ज़दा न रखते थे तुम से ये चश्म-दाश्त करते हो क़हर लुत्फ़ की जागा ग़ज़ब है क्या
हम पहले कभी तुमसे दिल-ज़दा नहीं थे, ऐ याद रखने वाले, यह कृपा और कहर का मेल कितना अद्भुत है।
3
इज़्ज़त भी बा'द ज़िल्लत बिसयार छेड़ है मज्लिस में जब ख़फ़ीफ़ किया फिर अदब है क्या
इज़्ज़त का भी ज़िल्लत के बाद बहुत मज़ाक किया गया है, तो महफ़िल में अब शिष्टाचार क्या है।
4
आए हम आप में तो न पहचाने फिर गए उस राह-ए-साब इश्क़ में यारो तअब है क्या
जब हम तुम्हारे पास आए, तो हमें पहचाना नहीं गया, और फिर हम चले गए। ऐ दोस्तों, इश्क़ का यह रास्ता क्या है?
5
हैराँ हैं उस दहन के अज़ीज़ान-ए-ख़ुर्दा-बीं ये भी मक़ाम हाए तअम्मुल तलब है क्या
उन लोगों को आश्चर्य है जो उस आग के प्रिय हैं, उन लोगों को जो जलने से प्रेम करते हैं; क्या यह भी विचार करने का एक स्थान है?
6
आँखें जो होवें तेरी तो तू ऐन कर रखे आलम तमाम गर वो नहीं तो ये सब है क्या
यदि तेरी आँखें मौजूद हों, तो तूने एक संपूर्ण संसार रच दिया है; अन्यथा, यह सब क्या है।
7
उस आफ़्ताब बिन नहीं कुछ सूझता हमें गर ये ही अपने दिन हैं तो तारीक शब है क्या
उस सूरज के बिना हमें कुछ समझ नहीं आता, और अगर ये ही हमारे दिन हैं, तो ये अंधेरी रात क्या है।
8
तुम ने हमेशा जौर-ओ-सितम बे-सबब किए अपना ही ज़र्फ़ था जो न पूछा सबब है क्या
तुमने हमेशा बिना किसी कारण अत्याचार और क्रूरता की; यह तुम्हारी अपनी अहंकार था जिसने कभी कारण नहीं पूछा।
9
क्यूँकर तुम्हारी बात करे कोई ए'तिबार ज़ाहिर में क्या कहो हो सुख़न ज़ेर-ए-लब है क्या
आज किस अवसर पर कोई आपके बारे में बात करे? आप खुलकर क्या कहेंगे, और आपके होंठों के नीचे क्या है?
10
उस मह बग़ैर 'मीर' का मरना अजब हुआ हर-चंद मर्ग-ए-आशिक़ मिस्कीं अजब है क्या
तुम्हारी याद के बिना 'मीर' का मरना अजीब था। हर दिन एक ग़रीब आशिक़ का रास्ता अजीब है क्या।
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