उस मह बग़ैर 'मीर' का मरना अजब हुआ — मीर तक़ी मीर

उस मह बग़ैर 'मीर' का मरना अजब हुआ हर-चंद मर्ग-ए-आशिक़ मिस्कीं अजब है क्या

“How strange it was for me to die without your remembrance, Mi'r, How strange is the path of the poor lover, day after day?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

तुम्हारी याद के बिना 'मीर' का मरना अजीब था। हर दिन एक ग़रीब आशिक़ का रास्ता अजीब है क्या।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा के दिल की बहुत गहरी बात कहता है। शायर पूछ रहे हैं कि उस महबूब के बिना मरना कितना अजीब होता है। वो कहते हैं कि आशिक़ का मरना तो हर हाल में दर्दनाक होता है, लेकिन उस 'साथ' के बिना जो मौत आती है, वो एक अलग ही तन्हाई है। यह इबादत और तड़प को बयान करता है कि वजूद का होना भी उस महबूब के साथ ही मुमकिन है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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