ग़ज़ल

हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए

हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए

ये ग़ज़ल प्रेम के गहरे और जटिल भावनात्मक अनुभवों का वर्णन करती है, जहाँ वक्ता स्वयं को और प्रियतम को एक ही अनुभव का हिस्सा मानता है। इसमें महबूब की सुंदरता और उसके प्रभाव में खो जाने की बात कही गई है, साथ ही वियोग और आत्म-सम्मान की भावना भी व्यक्त की गई है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
हम हुए, तुम हुए और 'मीर' हुए भी, उसके ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।
2
जिन की ख़ातिर की उस्तुख़्वाँ-शिकनी सो हम उन के निशान-ए-तीर हुए
जिनकी खातिर हमने जो विनम्र वेश धारण किया, वे हम उनके तीर के सिर्फ निशान बन गए।
3
नहीं आते कसो की आँखों में हो के आशिक़ बहुत हक़ीर हुए
आपकी आँखों में प्रेम नहीं आया, इसलिए आशिक़ बहुत हक़ीर हो गए।
4
आगे ये बे-अदाइयाँ कब थीं इन दिनों तुम बहुत शरीर हुए
ये बे-अदबी और शरारतें पहले कब की थीं, आजकल तो तुम बहुत ही शारीरिक हो गए हो।
5
अपने रोते ही रोते सहरा के गोशे गोशे में आब-गीर हुए
अपने रोते ही रोते सहरा के गोशे गोशे में आब-गीर हुए। (अर्थ: ऐसा प्रतीत होता है मानो रेगिस्तान के हर कोने में आँसू की नदियाँ बह निकली हों।)
6
ऐसी हस्ती अदम में दाख़िल है नय जवाँ हम न तिफ़्ल-ए-शीर हुए
ऐसी हस्ती अदम में दाख़िल है, नय जवाँ हम न तिफ़्ल-ए-शीर हुए। इसका शाब्दिक अर्थ है कि ऐसा कौन सा अस्तित्व है जो संयम की स्थिति में प्रवेश कर गया है, जो न तो एक नया युवा है और न ही शेर का बच्चा।
7
एक दम थी नुमूद बूद अपनी या सफ़ेदी की या अख़ीर हुए
एकदम थी नूमूद बूद अपनी, या सफेदी की या आख़िर हुए। इसका शाब्दिक अर्थ है कि एक हल्का सा चमकता हुआ आभास या चमक अपनी थी, या वह सफेदी थी, या फिर वह अंत था।
8
या'नी मानिंद-ए-सुब्ह दुनिया में हम जो पैदा हुए सौ पीर हुए
यानी, इस इंसानी दुनिया में, हम जो सौ दुख लेकर पैदा हुए।
9
मत मिल अहल-ए-दुवल के लड़कों से 'मीर'-जी उन से मिल फ़क़ीर हुए
मत मिल अहल-ए-दुवल के लड़कों से, मीर-जी उन से मिल फ़क़ीर हुए। इसका अर्थ है कि शायर को दरबारी लोगों के बेटों से नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि उनसे मिलकर फ़क़ीर अलग हो गया था।
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