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ग़ज़ल

इश्क़ में ने ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए

इश्क़ में ने ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए

यह ग़ज़ल बताती है कि सच्चे इश्क़ के लिए न सिर्फ़ जुनून, बल्कि ख़ौफ़-ओ-ख़तर और हिम्मत भी चाहिए। इसमें सच्चे प्रेम की गहराई को समझने के लिए बलिदान, शुद्ध आँसू, और गहरे निरीक्षण की नज़र की माँग की गई है।

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1
इश्क़ में ने ख़ौफ़-ओ-ख़तर चाहिए जान के देने को जिगर चाहिए
प्रेम में भय और खतरा चाहिए, जीवन देने को एक हृदय चाहिए।
2
क़ाबिल-ए-आग़ोश सितम दीदगाँ अश्क सा पाकीज़ा गुहर चाहिए
आग़ोश में लेने लायक, वह दृष्टि जो सताती है, एक आँसू के समान पवित्र रत्न की हकदार है।
3
हाल ये पहुँचा है कि अब ज़ो'फ़ से उठते पलक एक पहर चाहिए
हाल यह पहुँचा है कि अब ज़ोफ़ से उठते पलक को एक पहर चाहिए।
4
कम है शनासा-ए-ज़र-ए-दाग़-ए-दिल उस के परखने को नज़र चाहिए
दिल के सोने जैसे दाग़ को जानने के लिए नज़र की ज़रूरत होती है।
5
सैंकड़ों मरते हैं सदा फिर भी याँ वाक़ि' इक शाम-ओ-सहर चाहिए
सैकड़ों मरते हैं सदा फिर भी याँ, वाक़ि'आ इक शाम-ओ-सहर चाहिए। इसका शाब्दिक अर्थ है कि सैकड़ों लोग हमेशा मरते रहते हैं, फिर भी हमें बस एक शाम और एक सुबह चाहिए।
6
इश्क़ के आसार हैं बुल-हवस दाग़ ब-दिल-ए-दस्त बसर चाहिए
ऐ बुल-हवस, इश्क़ के आसार तो हैं, पर दिल के ज़ख्मों को एक अलग जगह पर गुज़ारिश चाहिए।
7
शर्त सलीक़ा है हर इक अमर में 'ऐब भी करने को हुनर चाहिए
हर अमर व्यक्ति में एक प्रकार की संजीदगी या कला निहित होती है; गलती करने की क्षमता रखना भी एक कौशल है।
8
जैसे जरस पारा गुलो क्या करूँ नाला-ओ-अफ़्ग़ाँ में असर चाहिए
जैसे गंगा की धारा मात्र एक नाला है, तो मैं क्या करूँ? मुझे नाला-ए-अफगान जैसा प्रभाव चाहिए।
9
ख़ौफ़ क़यामत का यही है कि 'मीर' हम को जिया बार-ए-दिगर चाहिए
यह भय क़यामत का यही है कि 'मीर', हमें एक अलग जीवन चाहिए।
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