हाल ये पहुँचा है कि अब ज़ो'फ़ से
उठते पलक एक पहर चाहिए
“The state I have reached is such that from these eyelids, I need a whole epoch to raise them.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
हाल यह पहुँचा है कि अब ज़ोफ़ से उठते पलक को एक पहर चाहिए।
विस्तार
यह शेर एक ऐसी अवस्था का वर्णन करता है, जहाँ थकान केवल शारीरिक नहीं, बल्कि रूहानी भी है। शायर कह रहे हैं कि उनकी हालत इतनी बिगड़ गई है कि पलकें उठाना भी एक बड़ी तपस्या है। उन्हें सिर्फ आँखें खोलने के लिए एक पूरा पहर चाहिए। यह सिर्फ़ नींद की बात नहीं है, यह उस वक़्त की बात है जब इंसान ज़िंदगी की ज़ोरदार लहरों से थक कर चूर हो जाता है।
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