Sukhan AI
ग़ज़ल

दिल साफ़ हो तो जल्वा-गह-ए-यार क्यूँ न हो

दिल साफ़ हो तो जल्वा-गह-ए-यार क्यूँ न हो

अगर दिल साफ़ हो तो प्रियतम का दिव्य रूप (जल्वा-गह) क्यों नहीं हो सकता। यह कविता बताती है कि अगर मन शुद्ध हो, तो दुनिया के हर पहलू में ईश्वर या प्रेम की झलक दिखाई देगी।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
दिल साफ़ हो तो जल्वा-गह-ए-यार क्यूँ हो आईना हो तो क़ाबिल-ए-दीदार क्यूँ हो
यदि हृदय शुद्ध है, तो प्रियतम का सौंदर्य क्यों नहीं प्रकट होगा? यदि दर्पण योग्य है, तो दृष्टि क्यों नहीं सुंदर होगी।
2
'आलम तमाम उस का गिरफ़्तार क्यूँ हो वो नाज़-पेशा एक है 'अय्यार क्यूँ हो
पूरे आलम का गिरफ़्तार वह एक नाज़-पेशा है, ऐय्यार, वह क्यों न हो।
3
मुस्तग़नियाना तो जो करे पहले ही सुलूक 'आशिक़ को फ़िक्र-ए-आक़िबत-कार क्यूँ हो
अगर कोई व्यक्ति पहले ही स्वयं को आत्मनिर्भरता की अवस्था में पहुंचा दे, तो प्रेमी को अंतिम परिणाम की चिंता क्यों नहीं होनी चाहिए।
4
रहमत ग़ज़ब में निसबत-ए-बर्क़-ओ-सहाब है जिस को शु'ऊर हो तो गुनहगार क्यूँ हो
रहमत ग़ज़ब में बिजली और बादलों का जुड़ाव है; जिसे यह एहसास हो तो दोषी क्यों न हो।
5
दुश्मन तो इक तरफ़ कि सबब रश्क का है याँ दर का शिगाफ़-ओ-रखना-ए-दीवार क्यूँ हो
दुश्मन तो बस ईर्ष्या का कारण है, तो क्यों न दरवाज़ा तोड़कर दीवार गिरा दी जाए।
6
आयात-ए-हक़ हैं सारे ये ज़र्रात-ए-काएनात इंकार तुझ को होवे सो इक़रार क्यूँ हो
शायर कहता है कि ये सारे कण (ज़र्रात) ब्रह्मांड के सत्य (हक़) के आयात हैं, इसलिए अगर तुम इसका इनकार कर सकते हो, तो क्यों न इसका इक़रार भी करो।
7
हर-दम की ताज़ा मर्ग-ए-जुदाई से तंग हूँ होना जो कुछ है आह सो यक-बार क्यूँ हो
मैं हर पल के ताज़े बिछड़ने के दर्द से तंग आ चुका हूँ; जो कुछ पाना है, वह बस एक बार क्यों नहीं हो जाता।
8
मू-ए-सफ़ेद हम को कहे है कि ग़ाफ़िलाँ अब सुब्ह होने आई है बेदार क्यूँ हो
सफ़ेद चाँद ने हमें कहा है कि हे ग़ाफ़िल लोगों, सुबह हो चुकी है, तुम जाग क्यों नहीं रहे?
9
नज़दीक अपने हम ने तो सब कर रखा है सहल फिर 'मीर' इस में मुर्दन-ए-दुश्वार क्यूँ हो
हमने अपने लिए सब कुछ आसान और निकट कर रखा है, फिर शायर 'मीर' इस में कठिन सहनशीलता क्यों नहीं कर पाता।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.