आयात-ए-हक़ हैं सारे ये ज़र्रात-ए-काएनात — मीर तक़ी मीर

आयात-ए-हक़ हैं सारे ये ज़र्रात-ए-काएनात इंकार तुझ को होवे सो इक़रार क्यूँ न हो

“All these particles of the universe are an import of Truth, so why should your denial not be an acknowledgement?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

शायर कहता है कि ये सारे कण (ज़र्रात) ब्रह्मांड के सत्य (हक़) के आयात हैं, इसलिए अगर तुम इसका इनकार कर सकते हो, तो क्यों न इसका इक़रार भी करो।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर का एक गहरा तफ़कर है। शायर कहते हैं कि ये पूरा काएनात, ये छोटे से छोटे ज़र्रा भी, एक बड़े सच की निशानी हैं। अगर आप इस सच्चाई को मानने से इनकार कर दें, तो फिर आप इसे क्यों स्वीकार नहीं कर लेते? यह न केवल ब्रह्मांड पर, बल्कि हमारे अपने यकीन और तसव्वुर पर भी एक गहरा सवाल है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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