रहमत ग़ज़ब में निसबत-ए-बर्क़-ओ-सहाब है — मीर तक़ी मीर

रहमत ग़ज़ब में निसबत-ए-बर्क़-ओ-सहाब है जिस को शु'ऊर हो तो गुनहगार क्यूँ न हो

“In the grace of the storm, there is an association with lightning and clouds; if one becomes aware of it, why shouldn't they be considered guilty?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

रहमत ग़ज़ब में बिजली और बादलों का जुड़ाव है; जिसे यह एहसास हो तो दोषी क्यों न हो।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ प्रकृति की बात नहीं करता, बल्कि ज़िंदगी के गहरे दर्शन की बात करता है। शायर कहते हैं कि दया और ग़ज़ब का रिश्ता, बादल और बिजली की तरह ही है। जब इंसान को यह सच्चाई समझ आती है कि जीवन में सब कुछ इतना संतुलित और शक्तिशाली है, तो यह अहसास इतना भारी होता है कि आप खुद को गुनहगार मानने लगते हैं। यह एक ज़िम्मेदारी का एहसास है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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