ग़ज़ल
कहे है कोहकन कर फ़िक्र मेरी ख़स्ता-हाली में
कहे है कोहकन कर फ़िक्र मेरी ख़स्ता-हाली में
ये ग़ज़ल जीवन की अनिश्चितताओं और प्रेम के जटिल अनुभवों पर आधारित है। इसमें वक्ता कोहकन के उपदेशों को नकारते हुए, अपनी ख़स्ता-हाली में भी ईश्वर का शुक्र अदा करता है। यह प्रेम की शक्ति, जीवन की क्षणभंगुरता और तसल्ली के लिए गाली की स्वीकार्यता जैसे विषयों को छूती है।
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1
कहे है कोहकन कर फ़िक्र मेरी ख़स्ता-हाली में
इलाही शुक्र करता हूँ तिरी दरगाह 'आली में
लोग मेरी खराब हालत पर फ़िक्र करते हैं, लेकिन मैं तेरी दरगाह में अल्लाह का शुक्रिया अदा करता हूँ।
2
मैं वो पज़मुर्दा सब्ज़ा हूँ कि हो कर ख़ाक से सरज़द
यकायक आ गया उस आसमाँ की पाएमाली में
मैं वह कोमल पौधा हूँ जो धूल से उत्पन्न हुआ है, / और अचानक आसमान की ओस से भरी चमक में आ गया।
3
तू सच कह रंग पाँ है ये कि ख़ून इश्क़-बाज़ाँ है
सुख़न रखते हैं कितने शख़्स तेरे लब की लाली में
क्या तू सच कह रहा है कि खून इश्क़ का वाद्य है? कितने लोग तेरे होंठों की लालिमा में बातें छिपाए रखते हैं।
4
बुरा कहना भी मेरा ख़ुश न आया उस को तो वर्ना
तसल्ली ये दिल-ए-नाशाद होता एक गाली में
उसे मेरा बुरा कहना भी अच्छा नहीं लगा, वरना यह खुशदिल दिल एक गाल में तसल्ली पाता।
5
मिरे उस्ताद को फ़िरदौस-ए-आ'ला में मिले जागा
पढ़ाया कुछ न ग़ैर-अज़-इश्क़ मुझ को ख़ुर्द-साली में
मेरे उस्ताद को फ़िरदौस-ए-आ'ला में मिले जागा, उन्होंने मुझे बचपन में इश्क़ के सिवा कुछ नहीं पढ़ाया।
6
ख़राबी 'इश्क़ से रहती है दिल पर और नहीं रहता
निहायत 'ऐब है ये इस दयार-ए-ग़म के वाली में
शायर कहता है कि दिल पर इश्क़ की खराबी ही बनी रहती है और कुछ और नहीं; यह निहायत ही बड़ी कमी है इस गम के घर में रहने वाली में।
7
निगाह-ए-चश्म पुर-ख़श्म-ए-बुताँ पर मत नज़र रखना
मिला है ज़हर ऐ दिल इस शराब-ए-पुरतगाली में
शायर कह रहे हैं कि रेगिस्तान की कश्मीरी भौंहों को घूरना मत, क्योंकि दिल का ज़हर इस मदहोश करने वाली शराब में मिल गया है।
8
शराब-ए-ख़ून बिन तड़पूँ से दिल लबरेज़ रहता है
भरे हैं संग-रेज़े मैं नय इस मीना-ए-ख़ाली में
खून की शराब के बिना, मेरा दिल बेचैन रहता है; इस नए खाली घड़े में मेरे साथी भरे हुए हैं।
9
ख़िलाफ़ उन और ख़ूबाँ के सदा ये जी में रहता है
यही तो 'मीर' इक ख़ूबी है मा'शूक़-ए-ख़याली में
यह दिल में एक ऐसी आदत है जो उन लोगों और सुंदर चीज़ों के विपरीत भी बनी रहती है, 'मीर' के अनुसार, यह कल्पना के महबूब में एक अनोखी ख़ूबी है।
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