ग़ज़ल

खोवें हैं नींद मेरी मुसीबत बयानीयाँ

खोवें हैं नींद मेरी मुसीबत बयानीयाँ

यह ग़ज़ल नींद को खो देने की पीड़ा और जीवन की मुसीबतों से भरी कहानियों का वर्णन करती है। इसमें महबूब के नखरे और बेवफाई की यादों से दिल टूटने का दर्द व्यक्त किया गया है। शायर अपनी मोहब्बत की यादों और तड़प को बयान करते हुए, जीवन की अनमनेहबानाई पर विलाप करता है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
खोवें हैं नींद मेरी मुसीबत बयानीयाँ तुम भी तो एक रात सुनो ये कहानियाँ
मेरी नींद मुसीबतों की बातों से खो गई है, तुम भी एक रात ये कहानियाँ सुनो।
2
क्या आग दे के तौर को की तर्क सर-कशी उस शो'ले की वही हैं शरारत की बानीयाँ
किस आग ने तर्क और स्वरूप को दिया है? वे तो उस ज्वाला की शरारत भरी बातें हैं।
3
सोहबत रखा किया वो सफिया-ओ-ज़लाल से दिल ही में ख़ूँ हुआ कीं मिरी नुक्ता-दानियाँ
उसने सफिया और ज़लाल जैसी कंपनी रखी, जिससे मेरा दिल लहूलुहान हो गया, हे मेरे नगीने जैसे दिल।
4
हम से तो कीने ही की अदाएँ चली गईं बे-लुत्फ़ियाँ यही यही ना-मेहरबानियाँ
हमसे तो अनगिनत अदाएँ चली गईं, ये बे-लतफ़ियाँ और यही ना-मेहरबानियाँ।
5
तलवार के तले ही गया अहद-ए-इम्बिसात मर मर के हम ने काटी हैं अपनी जवानियाँ
तलवार के नीचे ही समाप्त हो गया इम्बिसात का वादा; धीरे-धीरे मरकर हमने अपनी जवानी काट डाली।
6
गाली सिवाए मुझ से सुख़न मत किया करो अच्छी लगे हैं मुझ को तिरी बद-ज़बानियाँ
मुझसे गाली के सिवा कुछ और बात मत करना; मुझे तुम्हारी बुरी बातें अच्छी लगती हैं।
7
ग़ैरों ही के सुख़न की तरफ़ गोश-ए-यार थे इस हर्फ़-ए-ना-शिनो ने हमारी न मानियां
ग़ैरों के सुख़न की तरफ़ प्रिय की कानों का झुकाव था, पर 'न-श' के इस अक्षर ने हमारी बात नहीं मानी।
8
ये बे-क़रारियाँ न कभू इन नय-देखीयाँ जाँ-काहीयाँ हमारी बहुत सहल जानियाँ
ये बे-क़रारियाँ और ये नय-देखीयाँ (नई सुबहें) हमारी जानों ने बहुत सहली हैं।
9
मारा मुझे भी सान के ग़ैरों में उन ने 'मीर' क्या ख़ाक में मिलाईं मिरी जाँ-फ़िशानीयाँ
शायर कहते हैं कि उन्होंने मुझे भी अजनबियों के बीच मिला दिया है। वे पूछते हैं कि मेरी आत्मा की विशिष्ट पहचान को किस तरह की धूल में मिला दिया गया है।
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