Sukhan AI
ग़ज़ल

कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है

कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है

यह ग़ज़ल विरह की पीड़ा और समय के निरंतर बीत जाने की भावना को व्यक्त करती है। कवि कहता है कि मिलन की बात तो कह दो, क्योंकि रात गुजर जाती है, और जीवन के महत्वपूर्ण पल भी यूँ ही बीत जाते हैं। यह प्रेम में अनकही बातों और वक़्त के क्रूर खेल पर एक चिंतन है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है दिन गुज़र जाएँ हैं पर बात चली जाती है
वस्ल की रात के बारे में कुछ कहा जाता है, और फिर रात गुजर जाती है; दिन बीत गए हैं, लेकिन बातें चलती रहती हैं।
2
रह गए गाह तबस्सुम पे गहे बात ही पर बारे हम-नशीं औक़ात चली जाती है
जब हँसी होंठों पर रह गई, तो बात अधूरी रह गई, ऐ हम-नशीं, वक़्त गुज़रता चला जाता है।
3
टुक तो वक़्फ़ा भी कर गर्दिश-ए-दौराँ कि ये जान उम्र के हैफ़ ही क्या सात चली जाती है
हे जीवन के पथ, थोड़ा तो रुक भी जा ऐ गर्दिश-ए-दौराँ, कि ये जान उम्र के हैफ़ क्या सात चली जाती है।
4
याँ तो आती नहीं शतरंज-ज़माना की चाल और वाँ बाज़ी हुई मात चली जाती है
शायर कह रहा है कि जिस तरह से शतरंज का खेल चलता है, वैसी चाल यहाँ नहीं आती है, और दूसरी जगह पर खेलने से मात मिल जाती है।
5
रोज़ आने पे नहीं निस्बत-ए-इश्क़ी मौक़ूफ़ उम्र भर एक मुलाक़ात चली जाती है
हर रोज़ आने पर प्रेम का संबंध समाप्त नहीं होता; एक मुलाक़ात पूरे जीवन भर चली जाती है।
6
शैख़-ए-बे-नफ़स को नज़ला नहीं है नाक की राह ये है ज़िर्यान-ए-मनी धात चली जाती है
बिना साँस के शायर को नाक की सर्दी नहीं हो सकती; यह तो मन की नसों की धारा है जो बह जाती है।
7
ख़िर्क़ा मिंदील रिदा मस्त लिए जाते हैं शैख़ की सारी करामात चली जाती है
जब मस्तमौला (carefree soul) को ख़िर्क़ा (shawl), मिंदील (scarf) और रिदा (robe) पहनाए जाते हैं, तो एक शायर के अनुसार, एक शैख़ की सारी चमत्कारिक शक्ति चली जाती है।
8
है मुअज़्ज़िन जो बड़ा मुर्ग़ मुसल्ली उस की मस्तों से नोक ही की बात चली जाती है
मुअज़्ज़िन, जो एक बड़ा मुर्गा है, उसकी बातों से नशे में धुत लोग नोक-झोंक करना शुरू कर देते हैं।
9
पाँव रुकता नहीं मस्जिद से दम-ए-आख़िर भी मरने पर आया है पर लात चली जाती है
पाँव मस्जिद से अंतिम साँस तक नहीं रुकता; मरने के लिए आया है, पर लात मारता रहता है।
10
एक हम ही से तफ़ावुत है सुलूकों में 'मीर' यूँ तो औरों की मुदारात चली जाती है
शायर कहता है कि मेरे आचरण में मैं ही अलग हूँ, क्योंकि दूसरों की कमियाँ बस बीत जाती हैं।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.