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शैख़-ए-बे-नफ़स को नज़ला नहीं है नाक की राह ये है ज़िर्यान-ए-मनी धात चली जाती है

The Shaikh, who has no breath, does not suffer a nasal cold; this is the vein of the mind, which flows away.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

बिना साँस के शायर को नाक की सर्दी नहीं हो सकती; यह तो मन की नसों की धारा है जो बह जाती है।

विस्तार

यह शेर सांसारिक जीवन और रूहानी गहराई का फर्क बताता है। शायर कहते हैं कि जो शख़्स सच्चे दिल से तन्हा हो, जो दुनिया की फ़िक्र से परे हो, उसे मामूली सर्दी-ज़ुकाम से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि उसका ध्यान नाक की नज़दीकी राहों पर नहीं, बल्कि दिल की गहरी नसों में बहने वाले इश्क़ के दरिया पर होता है। यह इश्क़ की ताक़त को बयान करता है।

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