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ग़ज़ल

इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई

इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई

यह ग़ज़ल इश्क़ की राह में होने वाली अपमान, बेइज्जती और झूठे इल्जामों के दर्द को बयां करती है। शायर बताता है कि कैसे प्यार ने उसे न केवल झुकना सिखाया, बल्कि उसे अपमान और झूठे आरोपों का सामना भी करवाया। वह प्रेम की पीड़ा में अपने दिल की टूटन और अकेलेपन का एहसास कराता है।

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1
इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई आख़िर आख़िर जान दी यारों ने ये सोहबत हुई
प्रेम में अपमान हुआ, हल्कापन हुआ, और इल्जाम हुआ। आखिरकार, दोस्तों ने जान दी और यह साथ मिला।
2
अक्स उस बे-दीद का तो मुत्तसिल पड़ता था सुब्ह दिन चढ़े क्या जानूँ आईने की क्या सूरत हुई
वह अनदेखे चेहरे का प्रतिबिंब सुबह में लगातार रहता था; दिन के आगे बढ़ने पर मैं नहीं जानता कि आईने का रूप क्या हो गया होगा।
3
लौह-ए-सीना पर मिरी सौ नेज़ा-ए-ख़त्ती लगे ख़स्तगी इस दिल-शिकस्ता की इसी बाबत हुई
मेरे सीने के लोहे पर मेरे सौ खत (पत्रों) के भाले लगते हैं, इसी कारण से मेरा यह टूटा हुआ दिल थका हुआ हो गया है।
4
खोलते ही आँखें फिर याँ मूँदनी हम को पड़ीं दीद क्या कोई करे वो किस क़दर मोहलत हुई
आँखें खोलते ही फिर उन्हें बंद करने की इच्छा हुई; यह कौन सा नज़ारा है जो इतना मोहक ठहराव देता है।
5
पाँव मेरा कल्बा-ए-अहज़ाँ में अब रहता नहीं रफ़्ता रफ़्ता उस तरफ़ जाने की मुझ को लत हुई
मेरा पाँव अब दुःख के वैली (कल्बा-ए-अहज़ाँ) में नहीं रहता; मुझे धीरे-धीरे उस दिशा में जाने की आदत पड़ गई है।
6
मर गया आवारा हो कर मैं तो जैसे गर्द-बाद पर जिसे ये वाक़िआ' पहुँचा उसे वहशत हुई
अगर मैं आवारा बनकर मर गया तो बस धूल बनकर रह जाऊंगा, लेकिन जिसे यह घटना देख लेगा, उसके लिए यह एक त्रासदी होगी।
7
शाद ओ ख़ुश-ताले कोई होगा किसू को चाह कर मैं तो कुल्फ़त में रहा जब से मुझे उल्फ़त हुई
कोई होगा जो आनंद और खुशियों के बाग में किसी को चाह करेगा, लेकिन मैं तो तब से ही मदहोशी में रहा जब से मुझे प्रेम हुआ।
8
दिल का जाना आज कल ताज़ा हुआ हो तो कहूँ गुज़रे उस भी सानहे को हम-नशीं मुद्दत हुई
यदि आज दिल का भाव नया और ताज़ा है, तो कहो, क्योंकि बीते हुए उस समय से हम-नशीं होना बहुत मुद्दत हो गई है।
9
शौक़-ए-दिल हम ना-तवानों का लिखा जाता है कब अब तलक आफी पहुँचने की अगर ताक़त हुई
शौक़-ए-दिल हम ना-तवानों का लिखा जाता है कब, अब तलक आफी पहुँचने की अगर ताक़त हुई। (अर्थात्, हमारे दिल के ये अधूरे और कमजोर ख्वाहिशें कब पूरी होंगी, अगर हमें शांति के किनारे तक पहुंचने की ताकत मिल जाए।)
10
क्या कफ़-ए-दस्त एक मैदाँ था बयाबाँ इश्क़ का जान से जब उस में गुज़रे तब हमें राहत हुई
क्या हाथ की हथेली प्रेम का एक वीरान मैदान थी, जब जान उससे गुज़री तब हमें राहत मिली।
11
यूँ तो हम आजिज़-तरीन-ए-ख़ल्क़-ए-आलम हैं वले देखियो क़ुदरत ख़ुदा की गर हमें क़ुदरत हुई
यद्यपि हम इस संसार की थकी हुई प्रजा हैं, हे प्रिय, देखो अगर हमें ईश्वर की शक्ति दी जाए तो वह कैसी है।
12
गोश ज़द चट-पट ही मरना इश्क़ में अपने हुआ किस को इस बीमारी-ए-जाँ-काह से फ़ुर्सत हुई
मेरे प्रिय, इश्क़ में मर जाना एक पल का काम था, लेकिन इस रूह की बीमारी से किसी को फुर्सत कहाँ है।
13
बे-ज़बाँ जो कहते हैं मुझ को सो चुप रह जाएँगे मारके में हश्र के गर बात की रुख़्सत हुई
जो लोग बिना ज़ुबान के मेरे बारे में बात करते हैं, वे चुप हो जाएँगे, अगर मेरे जाने के विषय को ज़ोर से कहा गया।
14
हम न कहते थे कि नक़्श उस का नहीं नक़्क़ाश सहल चाँद सारा लग गया तब नीम-रुख़ सूरत हुई
हम कभी नहीं कहते थे कि उस का नक़्श नक़्क़ाश की सहूलियत नहीं है। जब चाँद पूरी तरह से खर्च हो गया, तब चेहरा कड़वा हो गया।
15
इस ग़ज़ल पर शाम से तो सूफ़ियों को वज्द था फिर नहीं मालूम कुछ मज्लिस की क्या हालत हुई
इस ग़ज़ल पर शाम को सूफ़ियों में एक तरह का उत्साह था, पर अब यह नहीं पता कि महफ़िल की क्या हालत हो गई है।
16
कम किसू को 'मीर' की मय्यत की हाथ आई नमाज़ ना'श पर उस बे-सर-ओ-पा की बला कसरत हुई
कम से कम 'मीर' की मय्यत पर नमाज़ के लिए, उस बे-सर-ओ-पा की बला का ना'श पर कसरत हुई।
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