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हम न कहते थे कि नक़्श उस का नहीं नक़्क़ाश सहल
चाँद सारा लग गया तब नीम-रुख़ सूरत हुई

We never said that the design was not the craftsman's ease, Only when the moon was consumed, did the face turn bitter.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

हम कभी नहीं कहते थे कि उस का नक़्श नक़्क़ाश की सहूलियत नहीं है। जब चाँद पूरी तरह से खर्च हो गया, तब चेहरा कड़वा हो गया।

विस्तार

यह शेर बताता है कि ज़िंदगी में कई बार सच्चाई का पता किसी बड़े बदलाव या घटना के बाद चलता है। शायर कहते हैं कि उन्हें कारीगर (नक़्क़ाश) की कला पर शक नहीं था। लेकिन जब चाँद पूरा खिला, तब महबूब का चेहरा कड़वा लगने लगा। इसका मतलब है कि कभी-कभी खूबसूरती या पूर्णता भी हमें निराशा या दुःख का एहसास करा देती है।

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