ग़ज़ल
हमें आमद-ए-'मीर' कल भा गई
हमें आमद-ए-'मीर' कल भा गई
यह ग़ज़ल मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के माध्यम से प्रेम की तीव्र अनुभूति और विरह के भावों को व्यक्त करती है। इसमें जीवन के क्षणभंगुर सौंदर्य और यादों के आघात का वर्णन है, जो मन को अस्थिर कर देता है।
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1
हमें आमद-ए-'मीर' कल भा गई
तरह इस में मजनूँ की सब पा गई
हमें 'मीर' का आगमन कल की तरह अचानक महसूस हुआ, जैसे इसमें मजनूँ का सारा सार प्रकट हो गया।
2
कहाँ का ग़ुबार-ए-आह दिल में ये था
मिरी ख़ाक बदली सी सब छा गई
दिल में यह आँसू-धूल कहाँ से आई, मेरी राख की तरह सब कुछ ढक गई।
3
क्या पास बुलबुल-ए-ख़िज़ाँ ने न कुछ
गुल-ओ-बर्ग बे-दर्द फैला गई
क्या पास शरद ऋतु की बुलबुल ने कुछ गुल-ओ-बर्ग (फूल और पत्तियाँ) बे-दर्द (बिना किसी दर्द के) फैला दिया?
4
हुई सामने यूँ तो एक एक के
हमें से वो कुछ आँख शर्मा गई
सामने होते ही, जैसे-जैसे हम उसे देखते गए, उसकी आँखों में थोड़ी सी शर्म दिखाई दी।
5
जिगर मुँह तक आते नहीं बोलते
ग़रज़ हम भी करते हैं क्या क्या गई
मन के भाव मुँह तक आते नहीं, और हम भी अपनी ज़रूरतें और इच्छाएँ रखते हैं।
6
न हम-रह कोई ना कसी से गया
मिरी लाश ता-गोर तन्हा गई
न मैं, न मेरा प्रिय कोई किसी के साथ गया; केवल मेरा शरीर तानसेन और टैगोर के पास अकेला गया।
7
घटा शम्अ' साँ क्यूँ न जाऊँ चला
तब-ए-ग़म जिगर को मिरे खा गई
घटा शम्अ' साँ क्यूँ न जाऊँ चला, मेरा प्रियतम! यह ग़म का वक़्त मेरे दिल को खा गया।
8
कोई रहने वाली है जान अज़ीज़
गई गर न इमरोज़ फ़र्दा गई
अगर कोई प्यारी जान यहाँ रहती है, तो अगर वह आज चली गई, तो वह कल भी चली जाएगी।
9
किए दस्त-ओ-पा गुम जो 'मीर' आ गया
वफ़ा-पेशा मज्लिस उसे पा गई
जब 'मीर' आ गए, तो वे हाथ और आँखें, जो खो गए थे, वफ़ा के समूह को पा गईं।
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