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क्या पास बुलबुल-ए-ख़िज़ाँ ने न कुछ
गुल-ओ-बर्ग बे-दर्द फैला गई

Did not the Nightingale of Autumn spread some Pain-free garden and leaf?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

क्या पास शरद ऋतु की बुलबुल ने कुछ गुल-ओ-बर्ग (फूल और पत्तियाँ) बे-दर्द (बिना किसी दर्द के) फैला दिया?

विस्तार

यह शेर पतझड़ के मौसम की उदासी और खूबसूरती को समेटे हुए है। शायर पूछते हैं कि क्या पास कोई 'बुलबुल-ए-ख़िज़ाँ' नहीं है, जिसने अपने साथ दर्द भरे फूल और पत्ते बिखेर दिए हों। यह बुलबुल, जो महबूब का प्रतीक है, पतझड़ की तरह ही जीवन के उस दर्द को दिखाता है, जहाँ हर खूबसूरत चीज़ के पीछे एक गहरा गम छिपा होता है।

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