ग़ज़ल

कोई अनीस कोई आश्ना नहीं रखते

کوئی انیس کوئی آشنا نہیں رکھتے
मीर अनीस· Ghazal· 10 shers· radif: नहीं रखते

यह ग़ज़ल एकांत, आत्म-निर्भरता और ईश्वर पर अटूट विश्वास को अभिव्यक्त करती है, जहाँ सांसारिक रिश्तों और सरोकारों से विरक्ति दिखाई गई है। इसमें टूटे हुए दिल के खामोश दर्द और बिना किसी शोर के अंदर ही अंदर सहने की पीड़ा को बेहद मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
कोई अनीस कोई आश्ना नहीं रखते किसी की आस बग़ैर अज़ ख़ुदा नहीं रखते
हम किसी को अपना साथी या परिचित नहीं बनाते, और ईश्वर के सिवा किसी और से कोई उम्मीद नहीं रखते हैं।
2
किसी को क्या हो दिलों की शिकस्तगी की ख़बर कि टूटने में ये शीशे सदा नहीं रखते
किसी को दिलों के टूटने की ख़बर कैसे हो सकती है, क्योंकि ये शीशे टूटते समय कोई आवाज़ नहीं करते।
3
फ़क़ीर दोस्त जो हो हम को सरफ़राज़ करे कुछ और फ़र्श ब-जुज़ बोरिया नहीं रखते
जो व्यक्ति फ़क़ीरों से दोस्ती रखता हो वह हमारे यहाँ आकर हमें सम्मान दे, क्योंकि हमारे पास बिछाने के लिए एक बोरिये (चटाई) के सिवा कुछ भी नहीं है।
4
मुसाफ़िरो शब-ए-अव्वल बहुत है तीरा ओ तार चराग़-ए-क़ब्र अभी से जला नहीं रखते
ऐ मुसाफ़िरो, पहली रात बहुत गहरी और अंधेरी होती है; क़ब्र का चिराग़ पहले से ही जलाकर नहीं रखा जाता।
5
वो लोग कौन से हैं ऐ ख़ुदा-ए-कौन-ओ-मकाँ सुख़न से कान को जो आश्ना नहीं रखते
हे समस्त सृष्टि के ईश्वर, वे कौन लोग हैं जो अपने कानों को शायरी और अच्छे कलाम से परिचित नहीं रखते?
6
मुसाफ़िरान-ए-अदम का पता मिले क्यूँकर वो यूँ गए कि कहीं नक़्श-ए-पा नहीं रखते
अदम (मृत्यु की दुनिया) की ओर जाने वाले मुसाफ़िरों का सुराग़ आख़िर कैसे मिले? वे इस तरह रुख़सत हुए कि अपने पीछे पैरों का कोई निशान तक नहीं छोड़ा।
7
तप-ए-दरूँ ग़म-ए-फ़ुर्क़त वरम-ए-पयादा-रवी मरज़ तो इतने हैं और कुछ दवा नहीं रखते
अंदरूनी बुखार, जुदाई का ग़म और पैदल चलने की वजह से आई सूजन; बीमारियाँ तो इतनी सारी हैं, मगर मेरे पास कोई दवा नहीं है।
8
खुलेगा हाल उन्हें जब कि आँख बंद हुई जो लोग उल्फ़त-ए-मुश्किल-कुशा नहीं रखते
जो लोग मुश्किलों को दूर करने वाले (मुश्किल-कुशा) से प्रेम नहीं रखते, उनकी वास्तविक स्थिति उन पर तब खुलेगी जब उनकी आँखें बंद हो जाएँगी (अर्थात जब मृत्यु होगी)।
9
जहाँ की लज़्ज़त ओ ख़्वाहिश से है बशर का ख़मीर वो कौन हैं कि जो हिर्स-ओ-हवा नहीं रखते
इंसान की फितरत दुनिया के मजे और चाहतों से ही बनी है, भला ऐसा कौन है जिसके दिल में लालच और ख्वाहिशें न हों?
10
'अनीस' बेच के जाँ अपनी हिन्द से निकलो जो तोशा-ए-सफ़र-ए-कर्बला नहीं रखते
ऐ अनीस! यदि तुम्हारे पास कर्बला की यात्रा के लिए मार्ग-व्यय (तोशा) नहीं है, तो अपनी जान बेचकर भी हिन्दुस्तान से रवाना हो जाओ।
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