वो लोग कौन से हैं ऐ ख़ुदा-ए-कौन-ओ-मकाँ सुख़न से कान को जो आश्ना नहीं रखते

“Who are those people, O Lord of all creation, / Whose ears remain strangers to the art of verse?”

— मीर अनीस
अर्थ

हे समस्त सृष्टि के ईश्वर, वे कौन लोग हैं जो अपने कानों को शायरी और अच्छे कलाम से परिचित नहीं रखते?

विस्तार

शायर पूरी कायनात के मालिक से बड़ी हैरत और हमदर्दी के साथ पूछता है कि वो कैसे बदनसीब लोग हैं, जिनके कानों ने कभी शायरी की मिठास नहीं चखी। उसके लिए 'सुख़न' सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात और रूह की सबसे ख़ूबसूरत आवाज़ है। यह शेर बताता है कि जो दिल शायरी के दर्द और हुस्न से बेख़बर हैं, उनकी ज़िंदगी इस विशाल जहां में कितनी बे-रंग और अधूरी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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