ग़ज़ल
उस की नज़रों में इंतिख़ाब हुआ
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यह ग़ज़ल महबूब की नज़रों में चुने जाने के सुखद अहसास और इश्क़ के कामयाब तिलिस्म को बयां करती है। हुस्न के अनोखे जादू और आपसी मुहब्बत के इक़रार से दिल में उमड़ने वाले जज़्बातों का इसमें ख़ूबसूरत इज़हार है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
उस की नज़रों में इंतिख़ाब हुआ
दिल अजब हुस्न से ख़राब हुआ
उसकी नज़रों ने इसे चुन लिया, और यह दिल एक अनोखे हुस्न के प्रभाव से बर्बाद हो गया।
2
इश्क़ का सेहर कामयाब हुआ
मैं तिरा तू मिरा जवाब हुआ
इश्क़ का जादू सफल हो गया; मैं तुम्हारा हो गया और तुम मेरा जवाब बन गए।
3
हर नफ़स मौज-ए-इज़्तिराब हुआ
ज़िंदगी क्या हुई अज़ाब हुआ
हर सांस बेचैनी और तड़प की एक लहर बन गई है, मानो ज़िंदगी जीने के बजाय महज़ एक अज़ाब (यातना) बनकर रह गई हो।
4
जज़्बा-ए-शौक़ कामयाब हुआ
आज मुझ से उन्हें हिजाब हुआ
मेरी चाहत और तड़प का जज़्बा आज सफल हो गया है, क्योंकि आज महबूब को मेरे सामने झिझक और शर्म महसूस हुई है।
5
मैं बनूँ किस लिए न मस्त-ए-शराब
क्यूँ मुजस्सम कोई शबाब हुआ
मैं शराब के नशे में मस्त क्यों न होऊँ, जब कोई साक्षात जवानी का रूप बनकर सामने आ गया है।
6
निगह-ए-नाज़ ले ख़बर वर्ना
दर्द महबूब-ए-इज़्तिराब हुआ
हे नाज़ भरी नज़र, मेरी सुध ले वरना यह दर्द मेरी बेचैनी का महबूब बन जाएगा।
7
मेरी बर्बादियाँ दुरुस्त मगर
तू बता क्या तुझे सवाब हुआ
माना कि मेरी बर्बादी जायज़ थी, लेकिन तू यह बता कि क्या मुझे बर्बाद करके तुझे कोई पुण्य या भलाई हासिल हुई?
8
ऐन क़ुर्बत भी ऐन फ़ुर्क़त भी
हाए वो क़तरा जो हबाब हुआ
अफ़सोस पानी की उस बूँद पर जो बुलबुला बन गई; वह पानी के अत्यंत निकट होते हुए भी उससे पूरी तरह अलग हो गई।
9
मस्तियाँ हर तरफ़ हैं आवारा
कौन ग़ारत-गर-ए-शराब हुआ
हर तरफ़ मस्ती और मदहोशी आवारा भटक रही है; शराब को लूटने या बर्बाद करने वाला आख़िर कौन है?
10
दिल को छूना न ऐ नसीम-ए-करम
अब ये दिल रू-कश-ए-हबाब हुआ
हे कृपा की मंद पवन, इस दिल को मत छूना क्योंकि अब यह पानी के बुलबुले के समान अत्यंत नाज़ुक हो गया है।
11
इश्क़-ए-बे-इम्तियाज़ के हाथों
हुस्न ख़ुद भी शिकस्त-याब हुआ
बिना किसी भेदभाव या अंतर वाले प्रेम के हाथों, स्वयं सौंदर्य को भी हार का सामना करना पड़ा।
12
जब वो आए तो पेश-तर सब से
मेरी आँखों को इज़्न-ए-ख़्वाब हुआ
जब वे आए, तो सबसे पहले मेरी आँखों को सोने (ख़्वाब देखने) की इजाज़त मिल गई।
13
दिल की हर चीज़ जगमगा उट्ठी
आज शायद वो बे-नक़ाब हुआ
दिल की हर चीज़ रोशनी से जगमगा उठी है; ऐसा लगता है कि शायद आज महबूब बे-नक़ाब हो गया है।
14
दौर-ए-हंगामा-ए-नशात न पूछ
अब वो सब कुछ ख़याल ओ ख़्वाब हुआ
खुशियों और उत्सव के उस दौर के बारे में मत पूछो, अब वह सब कुछ सिर्फ़ एक ख़याल और सपना बनकर रह गया है।
15
तू ने जिस अश्क पर नज़र डाली
जोश खा कर वही शराब हुआ
तुमने जिस भी आँसू पर अपनी नज़र डाली, वह जोश में आकर शराब बन गया।
16
सितम-ए-ख़ास-ए-यार की है क़सम
करम-ए-यार बे-हिसाब हुआ
मुझे महबूब के विशेष ज़ुल्म की क़सम है कि अब उस महबूब की मेहरबानी और कृपा बेहिसाब हो चुकी है।
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