ग़ज़ल
शाएर-ए-फ़ितरत हूँ जब भी फ़िक्र फ़रमाता हूँ मैं
شاعر فطرت ہوں جب بھی فکر فرماتا ہوں میں
इस ग़ज़ल में शायर स्वयं को प्रकृति का कवि बताते हुए यह व्यक्त करता है कि चिंतन की अवस्था में वह सृष्टि के कण-कण में समा जाता है। इसके साथ ही, महबूब की जुदाई से उत्पन्न खालीपन और गहरी बेचैनी का भी अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
शाएर-ए-फ़ितरत हूँ जब भी फ़िक्र फ़रमाता हूँ मैं
रूह बन कर ज़र्रे ज़र्रे में समा जाता हूँ मैं
मैं प्रकृति का शायर हूँ और जब भी मैं चिंतन करता हूँ, तो आत्मा बनकर इस कायनात के कण-कण में समा जाता हूँ।
2
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं
हे दोस्त, लौट आओ, क्योंकि तुम्हारे बिना मैं इस कदर बेचैन रहता हूँ मानो मुझे हर चीज़ में किसी न किसी चीज़ की कमी महसूस होती है।
3
जिस क़दर अफ़्साना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं
और भी बे-गाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं
मैं जीवन की कहानी को जितना अधिक दोहराता हूँ, उतना ही इस जीवन और अपने अस्तित्व से अनजान और बेगाना होता जाता हूँ।
4
जब मकान-ओ-ला-मकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं
अल्लाह अल्लाह तुझ को ख़ुद अपनी जगह पाता हूँ मैं
जब मैं स्थान और असीमता (मकान और ला-मकां) दोनों की हदों से आगे निकल जाता हूँ, तो अत्यंत आश्चर्य के साथ तुझे अपनी ही जगह पर पाता हूँ।
5
तेरी सूरत का जो आईना उसे पाता हूँ मैं
अपने दिल पर आप क्या क्या नाज़ फ़रमाता हूँ मैं
जब मैं अपने दिल को तुम्हारे चेहरे का आईना बना हुआ पाता हूँ, तो मुझे खुद अपने दिल पर बहुत नाज़ होता है।
6
यक-ब-यक घबरा के जितनी दूर हट आता हूँ मैं
और भी उस शोख़ को नज़दीक-तर पाता हूँ मैं
अचानक घबराकर मैं जितना दूर हट जाता हूँ, उस चंचल महबूब को अपने और भी ज़्यादा क़रीब पाता हूँ।
7
मेरी हस्ती शौक़-ए-पैहम मेरी फ़ितरत इज़्तिराब
कोई मंज़िल हो मगर गुज़रा चला जाता हूँ मैं
मेरा अस्तित्व निरंतर चाहत और मेरा स्वभाव बेचैनी है; कोई भी मंज़िल सामने आए, मैं बस उससे आगे बढ़ता चला जाता हूँ।
8
हाए-री मजबूरियाँ तर्क-ए-मोहब्बत के लिए
मुझ को समझाते हैं वो और उन को समझाता हूँ मैं
हाय, प्यार छोड़ने के लिए भी कैसी मजबूरियाँ हैं कि वे मुझे समझाने की कोशिश करते हैं और मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ।
9
मेरी हिम्मत देखना मेरी तबीअत देखना
जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं
मेरी हिम्मत और मेरा मिज़ाज देखिए कि जब भी कोई उलझन या गुत्थी सुलझ जाती है, मैं उसे फिर से उलझा देता हूँ।
10
हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है
अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं
हुस्न की मुझसे कोई दुश्मनी नहीं है और न ही इश्क़ से कोई बैर है, मैं तो ख़ुद अपने ही क़दमों से ठोकरें खा रहा हूँ।
11
तेरी महफ़िल तेरे जल्वे फिर तक़ाज़ा क्या ज़रूर
ले उठा जाता हूँ ज़ालिम ले चला जाता हूँ मैं
यह तुम्हारी ही महफ़िल है और तुम्हारे ही जलवे हैं, तो मुझे यहाँ से हटाने का तक़ाज़ा करने की क्या ज़रूरत थी? लो ऐ ज़ालिम, मैं ख़ुद ही यहाँ से उठकर चला जाता हूँ।
12
ता-कुजा ये पर्दा-दारी-हा-ए-इश्क़-ओ-लाफ़-ए-हुस्न
हाँ सँभल जाएँ दो-आलम होश में आता हूँ मैं
इश्क़ का यह पर्दा और हुस्न का यह घमंड कब तक चलेगा? अब दोनों जहाँ सँभल जाएँ क्योंकि मैं अपने होश में आ रहा हूँ।
13
मेरी ख़ातिर अब वो तकलीफ़-ए-तजल्ली क्यूँ करें
अपनी गर्द-ए-शौक़ में ख़ुद ही छुपा जाता हूँ मैं
मेरे लिए अब महबूब अपने नूर या दीदार को ज़ाहिर करने का कष्ट क्यों उठाए, जब मैं अपने ही शौक़ और तड़प की धूल में ख़ुद छुप जाता हूँ।
14
दिल मुजस्सम शेर-ओ-नग़्मा वो सरापा रंग-ओ-बू
क्या फ़ज़ाएँ हैं कि जिन में हल हुआ जाता हूँ मैं
मेरा दिल पूरी तरह से शेर और नग्मा बन चुका है और वह सिर से पाँव तक रंग और खुशबू है; यह कैसा वातावरण है जिसमें मैं खुद को घुलता हुआ महसूस कर रहा हूँ।
15
ता-कुजा ज़ब्त-ए-मोहब्बत ता-कुजा दर्द-ए-फ़िराक़
रहम कर मुझ पर कि तेरा राज़ कहलाता हूँ मैं
मैं कब तक अपनी मोहब्बत को छुपाए रखूँ और कब तक जुदाई का दर्द बर्दाश्त करूँ? मुझ पर रहम करो, क्योंकि आख़िरकार मैं तुम्हारा ही छुपा हुआ राज़ कहलाता हूँ।
16
वाह-रे शौक़-ए-शहादत कू-ए-क़ातिल की तरफ़
गुनगुनाता रक़्स करता झूमता जाता हूँ मैं
शहादत का यह कैसा अद्भुत शौक है कि मैं गुनगुनाता, नाचता और झूमता हुआ अपने क़ातिल की गली की ओर जा रहा हूँ।
17
या वो सूरत ख़ुद जहान-ए-रंग-ओ-बू महकूम था
या ये आलम अपने साए से दबा जाता हूँ मैं
या तो वह दौर था जब सारी दुनिया मेरे अधीन थी, या फिर अब यह हाल है कि मैं अपने ही साए से दबा जा रहा हूँ।
18
देखना इस इश्क़ की ये तुरफ़ा-कारी देखना
वो जफ़ा करते हैं मुझ पर और शरमाता हूँ मैं
इस इश्क़ का यह अनोखा करिश्मा देखिए कि ज़ुल्म तो वह मुझ पर करते हैं, लेकिन शर्म और संकोच मुझे महसूस होता है।
19
एक दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिस ऐ 'जिगर'
एक शीशा है कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं
ऐ जिगर, मेरे पास सिर्फ एक दिल है और उसके सामने हादसों व मुसीबतों का तूफ़ान है; मैं काँच की तरह नाज़ुक हूँ जो हर पत्थर से टकराता फिरता है।
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