ता-कुजा ज़ब्त-ए-मोहब्बत ता-कुजा दर्द-ए-फ़िराक़ — जिगर मुरादाबादी
“How long must love be restrained, how long this pain of parting borne? Have mercy on me, for after all, I am known as your secret.”
अर्थ
मैं कब तक अपनी मोहब्बत को छुपाए रखूँ और कब तक जुदाई का दर्द बर्दाश्त करूँ? मुझ पर रहम करो, क्योंकि आख़िरकार मैं तुम्हारा ही छुपा हुआ राज़ कहलाता हूँ।
विस्तार
इस शेर में आशिक़ अपने सब्र की हद और जुदाई के दर्द से बेहाल होकर महबूब से रहम की गुहार लगा रहा है। वह पूछता है कि आख़िर कब तक अपने जज़्बात को दबाकर रखा जाए और इस दूरी को सहा जाए। बड़ी नफ़ासत से वह महबूब को याद दिलाता है कि अगर वह टूट गया, तो महबूब का छुपा हुआ राज़ भी बेपर्दा हो जाएगा, इसलिए उस पर तरस खाना दरअसल महबूब के अपने हक में है।
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