मेरी ख़ातिर अब वो तकलीफ़-ए-तजल्ली क्यूँ करें — जिगर मुरादाबादी

मेरी ख़ातिर अब वो तकलीफ़-ए-तजल्ली क्यूँ करें अपनी गर्द-ए-शौक़ में ख़ुद ही छुपा जाता हूँ मैं

“Why should they take the trouble to reveal radiant glory for my sake? In the rising dust of my own yearning, I hide myself away.”

— जिगर मुरादाबादी

अर्थ

मेरे लिए अब महबूब अपने नूर या दीदार को ज़ाहिर करने का कष्ट क्यों उठाए, जब मैं अपने ही शौक़ और तड़प की धूल में ख़ुद छुप जाता हूँ।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ की बेपनाह तड़प और उसकी आजिज़ी का बड़ा दिलकश बयान है। शायर कहता है कि महबूब को अपना नूर या जलवा दिखाने की तकलीफ़ उठाने की क्या ज़रूरत है, जब मेरी अपनी दीवानगी और तलब की उड़ती हुई धूल ही मुझे ओझल करने के लिए काफ़ी है। यहाँ इश्क़ की बेकरारी खुद एक पर्दा बन जाती है, जो महबूब को ज़हमत से बचा लेती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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