“The entire realm of Beauty's essence and attributes fills my view; / Why should the longing of my brow be bound by a mere prostration?”
सौंदर्य के अस्तित्व और विशेषताओं का पूरा संसार मेरी नज़रों के सामने है, फिर मेरे माथे के झुकने का शौक़ केवल सजदे तक ही सीमित क्यों रहे?
शायर कहते हैं कि जब महबूब यानी उस ईश्वर के हुस्न का हर रूप, उसका वजूद और उसकी सिफ़ातें चारों तरफ़ नज़र आ रही हैं, तो इबादत किसी एक रस्म तक कैसे सिमट सकती है? उनका माथा सिर्फ़ एक सजदे में झुककर ख़ामोश नहीं होना चाहता, क्योंकि उन्हें हर ज़र्रे में उसी का नूर दिखाई देता है। यह शेर बतलाता है कि सच्ची भक्ति केवल ज़मीन पर माथा टेकने का नाम नहीं, बल्कि हर लम्हा उस असीम सुंदरता के सामने पूरी तरह समर्पित हो जाना है।
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