ज़ालिम उठा तू पर्दा-ए-वहम-ओ-गुमान-ओ-फ़िक्र क्या सामने वो मरहला-हाए-यक़ीं रहे

“O cruel one, lift this veil of doubt, conjecture, and thought; let us see if the realms of certainty can still remain before our eyes.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

ऐ ज़ालिम, तू वहम, गुमान और सोच का पर्दा हटा कर तो देख, क्या तब भी तेरे सामने यक़ीन की वो मंज़िलें क़ायम रहती हैं।

विस्तार

यहाँ शायर ज़िंदगी या अपने महबूब से बड़ी बेबाकी और शिकवे के साथ कह रहा है कि ज़रा वहम, शक और फ़ालतू सोच का यह पर्दा हटाकर तो देखो। हम अक्सर सच का सामना करने से कतराते हैं और ख़यालों के बुने जालों में उलझे रहते हैं। शायर यह देखना चाहता है कि जब सारे भरम टूटेंगे, तो क्या वह यकीन और भरोसा सचमुच टिक पाएगा जिस पर हमें इतना नाज़ है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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