आलम जब एक हाल पे क़ाएम नहीं रहे क्या ख़ाक ए'तिबार-ए-निगाह-ए-यक़ीं रहे

“When the world itself abides not in a constant state, / What trust, then, can the eye of certainty await?”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

जब यह संसार ही किसी एक अवस्था में स्थिर नहीं रहता, तो फिर यक़ीन की नज़र पर भला क्या भरोसा किया जा सकता है।

विस्तार

इस शेर में शायर ज़िंदगी और दुनिया के कभी न ठहरने वाले मिज़ाज पर बात कर रहा है। जब यह पूरी कायनात ही हर पल बदल रही है और किसी एक हाल पर टिकती नहीं, तो फिर इंसान अपनी नज़र और यकीन पर क्या भरोसा करे? 'क्या ख़ाक' का मुहावरा एक बेबसी और सच्चाई को बयां करता है—कि इस बदलती दुनिया में किसी भी बात या रिश्ते को हमेशा के लिए तय मान लेना महज़ एक वहम है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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