मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-दर्द-आफ़रीं रहे शायद मिरे हवास ठिकाने नहीं रहे

“A complaint against the creator of pain lingers upon my tongue; it seems my senses are no longer sound.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

मेरी ज़बान पर दर्द देने वाले का शिकवा रहता है, शायद अब मेरे होश-ओ-हवास ठिकाने नहीं रहे हैं।

विस्तार

इश्क़ की रवायत में महबूब से मिलने वाले दर्दों का कभी गिला नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें ख़ामोशी से सहना ही सच्ची वफ़ा मानी जाती है। मगर यहाँ शायर की ज़ुबान पर दर्द देने वाले के ख़िलाफ़ ही शिकायत आ गई है। इस पर शायर ख़ुद हैरान होकर कहता है कि शायद ग़म की शिद्दत ने मेरी सुध-बुध छीन ली है, क्योंकि होश-ओ-हवास में रहते हुए कोई सच्चा आशिक़ अपने महबूब से शिकवा करने की जुर्रत नहीं कर सकता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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