ग़ज़ल
कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में
کل کے لیے کر آج نہ خست شراب میں
इस ग़ज़ल में ग़ालिब ने इंसान के वक़ार, वर्तमान के आनंद और ईश्वर की असीम रहमत पर गहरा यक़ीन पेश किया है। वे साक़ी-ए-कौसर के फ़ैज़ पर भरोसा रखने की बात करते हुए मनुष्य की मौजूदा लाचारी और उसके अतीत के बुलंद मर्तबे के विरोधाभास को उजागर करते हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में
ये सू-ए-ज़न है साक़ी-ए-कौसर के बाब में
कल की चिंता करके आज शराब पीने में कंजूसी मत करो। ऐसा सोचना साक़ी-ए-कौसर की उदारता और रहमत पर शक करने जैसा है।
2
हैं आज क्यूँ ज़लील कि कल तक न थी पसंद
गुस्ताख़ी-ए-फ़रिश्ता हमारी जनाब में
आज हम इतने अपमानित क्यों हैं, जबकि कल तक हमारी शान में किसी फ़रिश्ते की ज़रा सी गुस्ताख़ी भी हमें बर्दाश्त नहीं थी?
3
जाँ क्यूँ निकलने लगती है तन से दम-ए-समा
गर वो सदा समाई है चंग ओ रबाब में
अगर वह आवाज़ सिर्फ़ चंग और रबाब (साज़ों) में ही समाई हुई है, तो फिर समा (संगीत) के समय जिस्म से जान क्यों निकलने लगती है?
4
रौ में है रख़्श-ए-उम्र कहाँ देखिए थमे
ने हाथ बाग पर है न पा है रिकाब में
ज़िंदगी का घोड़ा तेज़ रफ़्तार से दौड़े जा रहा है, न जाने कहाँ जाकर रुकेगा; न तो हाथ में लगाम है और न ही पाँव रकाब में है।
5
उतना ही मुझ को अपनी हक़ीक़त से बोद है
जितना कि वहम-ए-ग़ैर से हूँ पेच-ओ-ताब में
मैं अपनी वास्तविकता से उतना ही दूर हूँ, जितना कि किसी दूसरे के वहम व भ्रम की वजह से बेचैनी और उलझन में फंसा हुआ हूँ।
6
अस्ल-ए-शुहूद-ओ-शाहिद-ओ-मशहूद एक है
हैराँ हूँ फिर मुशाहिदा है किस हिसाब में
जब देखने वाला (शाहिद), दिखाई देने वाला (मशहूद) और देखने का अस्तित्व (शुहूद) मूल रूप से एक ही हैं, तो मैं हैरान हूँ कि फिर यह अलग से देखने का अनुभव (मुशाहिदा) किस गिनती में आता है।
7
है मुश्तमिल नुमूद-ए-सुवर पर वजूद-ए-बहर
याँ क्या धरा है क़तरा ओ मौज-ओ-हबाब में
समुद्र का अस्तित्व तो केवल अलग-अलग रूपों के प्रकट होने पर आधारित है, वरना बूँद, लहर और बुलबुले का अपना क्या वजूद है।
8
शर्म इक अदा-ए-नाज़ है अपने ही से सही
हैं कितने बे-हिजाब कि हैं यूँ हिजाब में
शर्म नाज़-ओ-अंदाज़ की एक अदा है, चाहे वह केवल अपने आप से ही क्यों न हो; मगर वे इस तरह पर्दे में रहकर भी कितने बेपर्दा और जाहिर हैं।
9
आराइश-ए-जमाल से फ़ारिग़ नहीं हुनूज़
पेश-ए-नज़र है आइना दाइम नक़ाब में
महबूब अभी तक अपने सौंदर्य को संवारने से फ़ुरसत में नहीं आया है, क्योंकि नक़ाब के भीतर भी उसकी आँखों के सामने हमेशा एक आईना रहता है।
10
है गै़ब-ए-ग़ैब जिस को समझते हैं हम शुहूद
हैं ख़्वाब में हुनूज़ जो जागे हैं ख़्वाब में
जिसे हम प्रत्यक्ष यथार्थ समझते हैं, वह वास्तव में पूरी तरह अनदेखा और रहस्यमय है; जो लोग ख़्वाब के भीतर जाग भी गए हैं, वे अभी भी ख़्वाब में ही हैं।
11
'ग़ालिब' नदीम-ए-दोस्त से आती है बू-ए-दोस्त
मश्ग़ूल-ए-हक़ हूँ बंदगी-ए-बू-तराब में
ऐ ग़ालिब, दोस्त के साथी से दोस्त की ही ख़ुशबू आती है; अबू तुराब (हज़रत अली) की ख़िदमत और बंदगी में रहकर मैं असल में ईश्वर (हक़) की इबादत में लीन हूँ।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
