अस्ल-ए-शुहूद-ओ-शाहिद-ओ-मशहूद एक है हैराँ हूँ फिर मुशाहिदा है किस हिसाब में

“The witness, the witnessed, and the act of witnessing are essentially one; I wonder then, to what reckoning does perception belong?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

जब देखने वाला (शाहिद), दिखाई देने वाला (मशहूद) और देखने का अस्तित्व (शुहूद) मूल रूप से एक ही हैं, तो मैं हैरान हूँ कि फिर यह अलग से देखने का अनुभव (मुशाहिदा) किस गिनती में आता है।

विस्तार

ग़ालिब इस शेर में अद्वैत और सूफ़ी दर्शन के गहरे राज़ को छूते हैं, जहाँ देखने वाला, दिखाई देने वाली चीज़ और देखने का अमल—सब बुनियादी तौर पर एक ही हक़ीक़त हैं। लेकिन फिर वह बड़ी मासूमियत और हैरानी से पूछते हैं कि अगर सब कुछ एक ही है, तो फिर यह दुनिया को अलग मानकर देखने का तमाशा आख़िर क्यों है? यह शेर ईश्वर और कायनात के इस ख़ूबसूरत खेल पर एक दोस्ताना और गहरा दार्शनिक सवाल उठाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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