है मुश्तमिल नुमूद-ए-सुवर पर वजूद-ए-बहर याँ क्या धरा है क़तरा ओ मौज-ओ-हबाब में

“The ocean's being rests upon the manifestation of forms; what independent essence lies in bubble, wave, or drop?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

समुद्र का अस्तित्व तो केवल अलग-अलग रूपों के प्रकट होने पर आधारित है, वरना बूँद, लहर और बुलबुले का अपना क्या वजूद है।

विस्तार

ग़ालिब यहाँ समंदर की मिसाल देकर ज़िंदगी और कायनात की एक गहरी रूहानी सच्चाई समझा रहे हैं। वो कहते हैं कि लहरें, बुलबुले और बूँदें कोई अलग वजूद नहीं रखते, बल्कि ये सब उस विशाल समंदर के ही तरह-तरह के रूप हैं। ठीक इसी तरह, हम सब की अलग-अलग पहचान और अहंकार महज़ एक दिखावा है; असल हक़ीक़त तो सिर्फ़ वही एक परम सत्य है जिससे यह पूरी दुनिया बनी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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