ग़ज़ल
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं
تیری صورت کو دیکھتا ہوں میں
इस ग़ज़ल में शायर महबूब के हुस्न में ईश्वर की कुदरत और कारीगरी का दीदार करता है। इसमें रूमानी और रूहानी जज़्बात के साथ-साथ नसीहत देने वाले नासेह के प्रति हल्की तंजिया ज़राफ़त भी झलकती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं
उस की क़ुदरत को देखता हूँ मैं
मैं तुम्हारे चेहरे को देखता हूँ और उसमें ईश्वर की अद्भुत कुदरत को देखता हूँ।
2
जब हुई सुब्ह आ गए नासेह
उन्हीं हज़रत को देखता हूँ मैं
जैसे ही सुबह हुई, नसीहत देने वाले आ पहुँचे; अब मैं बस इन्हीं हज़रत को देख रहा हूँ।
3
वो मुसीबत सुनी नहीं जाती
जिस मुसीबत को देखता हूँ मैं
जिस मुसीबत को मैं अपनी आँखों से देख रहा हूँ, वह ऐसी है कि उसका ज़िक्र सुनना भी बर्दाश्त नहीं होता।
4
देखने आए हैं जो मेरी नब्ज़
उन की सूरत को देखता हूँ मैं
जो लोग मेरी नब्ज़ जाँचने आए हैं, मैं उनकी तरफ़ या अपने मर्ज़ की परवाह किए बिना बस उनके चेहरे को देख रहा हूँ।
5
मौत मुझ को दिखाई देती है
जब तबीअत को देखता हूँ मैं
जब भी मैं अपनी हालत या तबीयत को देखता हूँ, तो मुझे केवल अपनी मौत ही नज़र आती है।
6
शब-ए-फ़ुर्क़त उठा उठा कर सर
सुब्ह-ए-इशरत को देखता हूँ मैं
जुदाई की रात में मैं बार-बार अपना सिर उठा कर ख़ुशी और मिलन की सुबह को देखता हूँ।
7
दूर बैठा हुआ सर-ए-महफ़िल
रंग-ए-सोहबत को देखता हूँ मैं
मैं महफ़िल में सबसे दूर बैठा हुआ केवल इस संगति और सभा के रंग-ढंग को देख रहा हूँ।
8
हर मुसीबत है बे-मज़ा शब-ए-ग़म
आफ़त आफ़त को देखता हूँ मैं
ग़म की इस रात में हर मुसीबत बे-मज़ा हो चुकी है, और मैं बस एक आफ़त को दूसरी आफ़त की ओर देखते हुए पा रहा हूँ।
9
न मोहब्बत को जानते हो तुम
न मुरव्वत को देखता हूँ मैं
तुम न तो प्रेम को समझते हो और न ही मुझे तुम्हारे अंदर कोई शराफत या मुरव्वत दिखाई देती है।
10
कोई दुश्मन को यूँ न देखेगा
जैसे क़िस्मत को देखता हूँ मैं
कोई अपने दुश्मन को भी उस नज़र से नहीं देखेगा, जिस तरह मैं अपनी क़िस्मत को देखता हूँ।
11
हश्र में 'दाग़' कोई दोस्त नहीं
सारी ख़िल्क़त को देखता हूँ मैं
क़यामत के दिन, ऐ दाग़, कोई भी दोस्त नहीं दिखाई दे रहा है; मैं पूरी दुनिया की भीड़ को देख रहा हूँ मगर कोई अपना नहीं मिलता।
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