न मोहब्बत को जानते हो तुम — दाग़ देहलवी

न मोहब्बत को जानते हो तुम न मुरव्वत को देखता हूँ मैं

“Neither do you know what love is, nor do I find in you any grace.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

तुम न तो प्रेम को समझते हो और न ही मुझे तुम्हारे अंदर कोई शराफत या मुरव्वत दिखाई देती है।

विस्तार

यह शेर दिल टूटने के बाद की उस गहरी ख़ामोशी और सच्चाई को बयां करता है, जहाँ कोई गिला नहीं बल्कि एक कड़वी हक़ीक़त सामने आ जाती है। 'मोहब्बत' तो एक गहरा और जज़्बाती रिश्ता है, लेकिन 'मुरव्वत' वह बुनियादी शराफ़त, लिहाज़ और अपनापन है जो इंसानियत के नाते बरता जाता है। शायर यहाँ सीधे और साफ़ लफ़्ज़ों में महबूब को आईना दिखाता है कि तुम्हारे पास न तो इश्क की गहराई है और न ही दूसरों के जज़्बातों की कद्र करने का सलीका।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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