दो तीन झटके दूँ जूँ ही वहशत के ज़ोर में ज़िंदाँ में टुकड़े होवें सलासिल के चार पाँच

“The moment I give two or three fierce jolts in the frenzy of madness, into four or five pieces shatter the chains within the prison.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

दीवानगी के ज़ोर में जैसे ही मैं दो-तीन झटके देता हूँ, क़ैदख़ाने में ज़ंजीरों के चार-पाँच टुकड़े हो जाते हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर इश्क़ के जुनून और दीवानगी की उस बेपनाह ताक़त को बयां कर रहा है, जो हर बंदिश को तोड़ देती है। ज़िंदाँ (क़ैदख़ाना) और सलासिल (ज़ंजीरें) दुनियावी पाबंदियों और रस्मों-रिवाज की प्रतीक हैं, लेकिन दीवाने की 'वहशत' यानी बेख़ुदी के आगे लोहे की बेड़ियाँ भी तिनकों की तरह बिखर जाती हैं। यह शेर साफ़ दिखाता है कि जब दिल में आज़ादी और बेपनाह मोहब्बत का तूफ़ान उठता है, तो कोई भी क़ैद उसे रोक नहीं सकती।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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