न हों जिन के ठिकाने होश वो मंज़िल को क्या पहुँचे कि रस्ता हाथ आया जिस की हुश्यारी से हाथ आया

“How can those bereft of wits ever reach their goal? Whoever found the path, found it through vigilance alone.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

जिनके होश ठिकाने न हों, वे अपनी मंज़िल तक कभी नहीं पहुँच सकते, क्योंकि जिसे भी सही रास्ता मिला है, वह उसकी समझदारी और सतर्कता से ही मिला है।

विस्तार

यह शेर ज़िंदगी के सफ़र में सजगता और होशमंदी की अहमियत को बड़ी सादगी से समझाता है। शायर कहते हैं कि मंज़िल सिर्फ़ उसी को नसीब होती है जो राह की पेचीदगियों में अपनी सूझबूझ और नज़र चौकन्नी रखे। बेख़याली और बेदिली से चलने वाले मुसाफ़िर अक्सर भटक जाते हैं, क्योंकि रास्ता भी उसी के हाथ आता है जो पूरी तरह बेदार और बाहोश हो।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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