ग़ज़ल

अपने पहलू से वो ग़ैरों को उठा ही न सके

اپنے پہلو سے وہ غیروں کو اٹھا ہی نہ سکے
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 9 shers· radif: ही न सके

यह ग़ज़ल अनकहे दर्द, प्रियतम की बेरुखी और प्रेमी की विवशता की मार्मिक अभिव्यक्ति है। इसमें कवि अपने दिल का हाल न कह पाने का रंज व्यक्त करता है क्योंकि महबूब गैरों से घिरा हुआ है, साथ ही वह प्रियतम के उस अगम्य रूप को दर्शाता है जो विशाल कल्पना में भी समा न सका।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
अपने पहलू से वो ग़ैरों को उठा ही न सके उन को हम क़िस्सा-ए-ग़म अपना सुना ही न सके
वे अपने पास से ग़ैरों को हटा ही नहीं सके, और हम उन्हें अपने दुख की दास्तान सुना ही नहीं पाए।
2
ज़ेहन मेरा वो क़यामत कि दो-आलम पे मुहीत आप ऐसे कि मिरे ज़ेहन में आ ही न सके
मेरा ज़ेहन ऐसा कमाल का है कि दोनों जहाँ पर छाया हुआ है, मगर आप ऐसे हैं कि मेरी सोच में समा ही नहीं सके।
3
देख लेते जो उन्हें तो मुझे रखते म'अज़ूर शैख़-साहिब मगर उस बज़्म में जा ही न सके
अगर शैख़ साहब मेरे महबूब को देख लेते तो वे मेरी हालत को मजबूर मानकर मुझे माफ़ कर देते, मगर वे उस महफ़िल में कभी जा ही नहीं सके।
4
अक़्ल महँगी है बहुत इश्क़ ख़िलाफ़-ए-तहज़ीब दिल को इस अहद में हम काम में ला ही न सके
अक़्ल बहुत महँगी है और इश्क़ तहज़ीब के ख़िलाफ़ माना जाता है, इसलिए इस ज़माने में हम दिल का कोई इस्तेमाल ही नहीं कर सके।
5
हम तो ख़ुद चाहते थे चैन से बैठें कोई दम आप की याद मगर दिल से भुला ही न सके
हम तो खुद चाहते थे कि कुछ देर चैन और सुकून से बैठें, लेकिन आपके ख्याल को अपने दिल से भुला ही नहीं सके।
6
इश्क़ कामिल है उसी का कि पतंगों की तरह ताब नज़्ज़ारा-ए-माशूक़ की ला ही न सके
सच्चा और मुकम्मल प्रेम केवल उसी का है जो पतंगे की तरह अपने महबूब के दीदार की ताब (सहनशक्ति) न ला सके।
7
दाम-ए-हस्ती की भी तरकीब अजब रक्खी है जो फँसे उस में वो फिर जान बचा ही न सके
जीवन के इस जाल की बनावट भी अजीब रखी गई है कि जो एक बार इसमें फँस जाता है, वह फिर अपनी जान नहीं बचा पाता।
8
मज़हर-ए-जल्वा-ए-जानाँ है हर इक शय 'अकबर' बे-अदब आँख किसी सम्त उठा ही न सके
हे अकबर, हर एक चीज़ में प्रियतम का नूर और जलवा दिखाई देता है, इसलिए कोई भी गुस्ताख़ आँख किसी भी दिशा में उठने की हिम्मत नहीं कर सकती।
9
ऐसी मंतिक़ से तो दीवानगी बेहतर 'अकबर' कि जो ख़ालिक़ की तरफ़ दिल को झुका ही न सके
अकबर कहते हैं कि ऐसी तर्कशीलता (मंतिक़) से तो पागलपन कहीं बेहतर है, जो इंसान के दिल को अपने सृष्टिकर्ता की ओर झुका भी न सके।
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