ज़ेहन मेरा वो क़यामत कि दो-आलम पे मुहीत आप ऐसे कि मिरे ज़ेहन में आ ही न सके

“Such a marvel is my mind that it encompasses both the worlds, yet so beyond are you that you could never be contained within my thought.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

मेरा ज़ेहन ऐसा कमाल का है कि दोनों जहाँ पर छाया हुआ है, मगर आप ऐसे हैं कि मेरी सोच में समा ही नहीं सके।

विस्तार

यहाँ शायर अपनी असीमित कल्पना और महबूब की बेमिसाल शान के बीच एक दिलचस्प कशमकश पेश करता है। वह कहता है कि उसका ज़ेहन इतना वसीअ है कि दोनों जहानों को अपनी सोच में समेट ले, मगर महबूब का वजूद इतना अज़ीम है कि वह इस ज़ेहन की हद में भी नहीं समा सका। यह शेर दरअस्ल अक़्ल के तमाम दावों पर दिल और इश्क़ की लाज़वाब जीत का इज़हार है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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