इश्क़ कामिल है उसी का कि पतंगों की तरह ताब नज़्ज़ारा-ए-माशूक़ की ला ही न सके

“His love alone is consummate who, like the fragile moth, could never bear the blinding sight of the beloved's face.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

सच्चा और मुकम्मल प्रेम केवल उसी का है जो पतंगे की तरह अपने महबूब के दीदार की ताब (सहनशक्ति) न ला सके।

विस्तार

शायर ने यहाँ शमा और परवाने के मशहूर रिश्ते के ज़रिए सच्चे इश्क़ की पहचान समझाई है। उनका कहना है कि मुकम्मल मोहब्बत वही है, जिसमें महबूब के नूर की एक झलक भी दिल को बेहाल कर दे और आशिक़ अपनी सुध-बुध खो बैठे। जैसे पतंगा शमा की तपिश और रोशनी बर्दाश्त न करते हुए खुद को फ़ना कर देता है, वैसे ही सच्चा प्रेमी महबूब के जलाल के आगे खुद को मिटा देने में ही इश्क़ की कामयाबी देखता है।

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