अपने पहलू से वो ग़ैरों को उठा ही न सके उन को हम क़िस्सा-ए-ग़म अपना सुना ही न सके

“They could not bring themselves to dismiss rivals from their side; nor could we ever recount our sorrow's tale to them.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

वे अपने पास से ग़ैरों को हटा ही नहीं सके, और हम उन्हें अपने दुख की दास्तान सुना ही नहीं पाए।

विस्तार

यह शेर उस बेबसी और अनकहे दर्द को बयां करता है, जहाँ आशिक़ अपने महबूब से तन्हाई में दिल की बात कहना चाहता था। महबूब ग़ैरों की महफ़िल से खुद को अलग न कर सका, और आशिक़ अपनी मोहब्बत व ग़म की दास्तान लफ़्ज़ों में ढालने से महरूम रह गया। सारा दर्द इसी बात का है कि दिल का क़िस्सा अनसुना ही रह गया, क्योंकि दोनों के बीच कभी वो तन्हाई और अपनापन आ ही न सका जिसकी उम्मीद थी।

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