दाम-ए-हस्ती की भी तरकीब अजब रक्खी है जो फँसे उस में वो फिर जान बचा ही न सके

“Strange indeed is the contrivance of this snare of existence; whoever is caught within it can never escape with life.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

जीवन के इस जाल की बनावट भी अजीब रखी गई है कि जो एक बार इसमें फँस जाता है, वह फिर अपनी जान नहीं बचा पाता।

विस्तार

शायर ने ज़िंदगी को 'दाम-ए-हस्ती' यानी वजूद के एक ऐसे अनोखे जाल के रूप में पेश किया है, जिसकी बनावट बड़ी तिलिस्मी है। इंसान जैसे ही इस दुनिया में क़दम रखता है, वह चाहतों, रिश्तों और दुनियावी उलझनों में इस कदर उलझ जाता है कि बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है। इस शेर की गहरी बात यही है कि ज़िंदगी का खेल ऐसा रचा गया है जहाँ से कोई भी अपनी जान सलामत लेकर नहीं लौट सकता—इस जाल में फँसने का अंजाम ही मौत है।

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