“Every single thing reflects the Beloved's radiant grace, O Akbar; in no direction could an irreverent eye dare lift its gaze.”
हे अकबर, हर एक चीज़ में प्रियतम का नूर और जलवा दिखाई देता है, इसलिए कोई भी गुस्ताख़ आँख किसी भी दिशा में उठने की हिम्मत नहीं कर सकती।
इस शेर में अकबर एक सूफ़ियाना नज़रिए से कायनात को देखने की बात कर रहे हैं। दुनिया की हर चीज़ में महबूब-ए-हक़ीक़ी (ईश्वर) का ही नूर चमक रहा है, इसलिए जहाँ भी नज़र पड़े, वह एक पवित्र इबादत बन जाती है। जब हर ज़र्रे में वही मौजूद है, तो इंसान की आँखें अदब और इज़्ज़त से झुक जाती हैं और किसी भी चीज़ को बेपरवाही या गुस्ताख़ी से देखने की जुर्रत नहीं कर पातीं।
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