ग़ज़ल
अगर दिल वाक़िफ़-ए-नैरंगी-ए-तब-ए-सनम होता
اگر دل واقف نیرنگیٔ طبع صنم ہوتا
यह ग़ज़ल प्रेम के दर्द और दिल की बेबसी को बयां करती है, जहाँ शायर दिल को ही सारे दुखों और तकलीफ़ों की जड़ मानता है। उसका मानना है कि यदि दिल महबूब और दुनिया के दोहरेपन से वाक़िफ़ होता, तो उसे कोई रंज न होता और इस दिल के बिना ज़िंदगी बेहद सुकून से गुज़रती।
Source: rekhta · HI
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1
अगर दिल वाक़िफ़-ए-नैरंगी-ए-तब-ए-सनम होता
ज़माने की दो-रंगी का उसे हरगिज़ न ग़म होता
अगर दिल महबूब के बदलते स्वभाव से पहले ही वाक़िफ़ होता, तो उसे ज़माने के दोहरेपन और धोखे का कभी कोई ग़म न होता।
2
ये पाबंद-ए-मुसीबत दिल के हाथों हम तो रहते हैं
नहीं तो चैन से कटती न दिल होता न ग़म होता
हम अपने दिल के कारण ही परेशानियों और मुसीबतों में बंधे रहते हैं, वरना यदि यह दिल न होता तो कोई दुख भी न होता और ज़िंदगी सुकून से कटती।
3
उन्हीं की बे-वफ़ाई का ये है आठों-पहर सदमा
वही होते जो क़ाबू में तो फिर काहे को ग़म होता
मुझे रात-दिन उनकी बेवफ़ाई का ही सदमा रहता है; अगर वे मेरे वश में होते, तो भला मुझे कोई दुख क्यों होता?
4
लब-ओ-चश्म-ए-सनम गर देखने पाते कहीं शाइ'र
कोई शीरीं-सुख़न होता कोई जादू-रक़म होता
अगर शायर कहीं महबूब के होंठ और आँखें देख पाते, तो कोई मीठे बोल बोलने वाला बन जाता और कोई जादुई शायरी लिखने वाला हो जाता।
5
बहुत अच्छा हुआ आए न वो मेरी अयादत को
जो वो आते तो ग़ैर आते जो ग़ैर आते तो ग़म होता
यह बहुत अच्छा हुआ कि वे मेरी बीमारी में मेरा हालचाल पूछने नहीं आए। अगर वे आते तो उनके साथ ग़ैर (प्रतिद्वंद्वी) भी आते, और उनके आने से मुझे बहुत दुख होता।
6
अगर क़ब्रें नज़र आतीं न दारा-ओ-सिकन्दर की
मुझे भी इश्तियाक़-ए-दौलत-ओ-जाह-ओ-हशम होता
अगर मैंने दारा और सिकंदर जैसे महान शासकों की क़ब्रें न देखी होतीं, तो मुझे भी धन-दौलत, ऊँचे पद और शान-ओ-शौकत की चाह होती।
7
लिए जाता है जोश-ए-शौक़ हम को राह-ए-उल्फ़त में
नहीं तो ज़ोफ़ से दुश्वार चलना दो-क़दम होता
मोहब्बत के रास्ते पर मुझे सिर्फ़ मेरे शौक़ और चाहत का जोश ही आगे लिए जा रहा है, वरना कमज़ोरी की वजह से मेरे लिए दो क़दम चलना भी मुश्किल होता।
8
न रहने पाए दीवारों में रौज़न शुक्र है वर्ना
तुम्हें तो दिल-लगी होती ग़रीबों पर सितम होता
यह शुक्र की बात है कि दीवारों में कोई सुराख़ या झरोखा नहीं रहा, वरना आपके लिए तो यह महज़ दिललगी होती मगर ग़रीबों पर बड़ा ज़ुल्म होता।
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