ग़ज़ल
सोहबत-ए-ग़ैर मूं जाया न करो
صحبت غیر موں جایا نہ کرو
इस ग़ज़ल में आशिक़ अपने महबूब से ग़ैरों की सोहबत से दूर रहने और विरह में तड़पते प्रेमियों को न सताने की भावुक इल्तिजा करता है। वह महबूब को हक़-परस्ती और इंसाफ़ की दुहाई देते हुए बेगुनाह चाहने वालों पर ज़ुल्म न ढहाने की नसीहत देता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
सोहबत-ए-ग़ैर मूं जाया न करो
दर्द-मंदाँ कूँ कुढ़ाया न करो
दूसरों (ग़ैरों) की संगत में मत जाया करो और दर्द से पीड़ित दुखियारों को मत तड़पाया करो।
2
हक़-परस्ती का अगर दावा है
बे-गुनाहाँ कूँ सताया न करो
अगर तुम सच्चाई और हक़ पर चलने का दावा करते हो, तो बेगुनाह और मासूम लोगों को परेशान मत करो।
3
अपनी ख़ूबी के अगर तालिब हो
अपने तालिब कूँ जलाया न करो
यदि आप अपनी अच्छाई या ख़ूबसूरती की चाह रखते हैं, तो अपने चाहने वाले को मत तड़पाया या जलाया कीजिए।
4
है अगर ख़ातिर-ए-उश्शाक़ अज़ीज़
ग़ैर कूँ दर्स दिखाया न करो
अगर आपको अपने प्रेमियों के दिल की परवाह है, तो किसी ग़ैर (पराए) को अपना दीदार मत कराया कीजिए।
5
मुझ को तुरशी का है परहेज़ सनम
चीन-ए-अबरू कूँ दिखाया न करो
हे महबूब, मुझे खट्टी चीज़ों (तुरशी) से परहेज़ है, इसलिए अपने माथे और भौंहों पर शिकन (बल) डालकर मुझे मत दिखाया करो।
6
दिल कूँ होती है सजन बेताबी
ज़ुल्फ़ कूँ हाथ लगाया न करो
हे सजन, मेरे दिल को बेचैनी होती है, इसलिए अपनी ज़ुल्फ़ों को हाथ मत लगाया करो।
7
निगह-ए-तल्ख़ सूँ अपनी ज़ालिम
ज़हर का जाम पिलाया न करो
ऐ ज़ालिम! अपनी कड़वी नज़रों से मुझे ज़हर का प्याला मत पिलाया करो।
8
हम कूँ बर्दाश्त नहीं ग़ुस्से की
बे-सबब ग़ुस्से में आया न करो
मुझसे ग़ुस्सा बर्दाश्त नहीं होता, इसलिए बिना किसी वजह के ग़ुस्से में मत आया करो।
9
पाक-बाज़ाँ में है मशहूर 'वली'
उस सूँ चेहरे कूँ छुपाया न करो
वली पवित्र और सच्चे प्रेमियों में प्रसिद्ध हैं, इसलिए उनसे अपना चेहरा मत छिपाया करो।
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