“From the blaze of parting with that tulip-faced beloved, O Wali, this scar upon my breast remains as a lasting keepsake.”
ऐ वली, लाला जैसे सुर्ख़ चेहरे वाले महबूब की जुदाई की आग से मेरे सीने पर जो दाग़ लगा है, वह एक यादगार निशानी है।
वली दकनी यहाँ मोहब्बत के उस दर्द की बात कर रहे हैं जिसे आशिक़ किसी अनमोल तोहफ़े की तरह सहेज कर रखता है। महबूब के हुस्न को सुर्ख़ लाला (ट्यूलिप) के फूल जैसा बताया गया है, और उसकी जुदाई की आग ने सीने पर जो दाग़ छोड़ा है, वह कोई ज़ख़्म नहीं बल्कि उसकी एक प्यारी निशानी है। यह शेर बड़ी नफ़ासत से दिखाता है कि इश्क़ में मिला दर्द भी अगर महबूब की याद दिलाए, तो दिल को कितना अज़ीज़ होता है।
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