ग़ज़ल
आ गया फिर रमज़ाँ क्या होगा
آ گیا پھر رمضاں کیا ہوگا
इस ग़ज़ल में शायर रिंदाना अंदाज़ में रमज़ान के आगमन पर मयख़ाने और शराब से दूरी का शिकवा करता है। वह पारंपरिक धर्मपरायणता के मुक़ाबले इश्क़ की तड़प को वरीयता देते हुए कहता है कि महबूब की मौजूदगी के बिना जन्नत का तसव्वुर भी बेमानी है।
Source: rekhta · HI
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1
आ गया फिर रमज़ाँ क्या होगा
हाए ऐ पीर-ए-मुग़ाँ क्या होगा
रमज़ान का महीना फिर आ गया है, अब क्या होगा? अफ़सोस, ऐ मयख़ाने के बुज़ुर्ग (पीर-ए-मुग़ाँ), अब हमारा क्या बनेगा?
2
बाग़-ए-जन्नत में समाँ क्या होगा
तू नहीं जब तो वहाँ क्या होगा
जन्नत के बाग़ का नज़ारा कैसा होगा? जब तुम ही वहाँ नहीं होगे, तो फिर वहाँ क्या होगा।
3
ख़ुश वो होता है मिरे नालों से
और अंदाज़-ए-फ़ुग़ाँ क्या होगा
मेरे रोने और आह-ओ-ज़ारी करने से महबूब ख़ुश होता है, तो फिर फ़रियाद करने का इससे बेहतर और क्या अंदाज़ हो सकता है।
4
दूर की राह है सामाँ हैं बड़े
इतनी मोहलत है कहाँ क्या होगा
रास्ता बहुत लंबा है और सामान बहुत ज़्यादा है, जबकि इतना समय या मोहलत ही नहीं है; ऐसे में न जाने क्या होगा।
5
देख लो रंग-ए-परीदा को मिरे
दिल जलेगा तो धुआँ क्या होगा
मेरे चेहरे के उड़े हुए रंग को देख लो, जब मेरा दिल जलेगा तो सोचो उससे कैसा धुआँ निकलेगा।
6
होगा बस एक निगह में जो तमाम
वो ब-हसरत निगराँ क्या होगा
जो केवल एक ही नज़र में ख़त्म हो जाएगा, वह भला हसरत भरी नज़रों से देर तक क्या देख सकेगा?
7
हम ने माना कि मिला मुल्क-ए-जहाँ
न रहे हम तो जहाँ क्या होगा
मान लीजिए कि हमें पूरी दुनिया की सल्तनत मिल भी जाए, लेकिन अगर हम ही ज़िंदा न रहे तो फिर इस दुनिया का हमारे लिए क्या मतलब रह जाएगा।
8
मर के जब ख़ाक में मिलना ठहरा
फिर ये तुर्बत का निशाँ क्या होगा
जब मरने के बाद मिट्टी में ही मिल जाना तय है, तो फिर क़ब्र का निशान बनाने का क्या औचित्य है?
9
जिस तरह दिल हुआ टुकड़े अज़-ख़ुद
चाक इस तरह कताँ क्या होगा
जिस तरह मेरा दिल अपने आप टुकड़े-टुकड़े हो गया, क्या उस तरह कभी कताँ (बारीक कपड़ा) भी फट सकता है?
10
या तिरा ज़िक्र है या नाम तिरा
और फिर विर्द-ए-ज़बाँ क्या होगा
मेरी ज़बान पर या तो तुम्हारा ज़िक्र रहता है या फिर तुम्हारा नाम, इसके अलावा भला मेरी ज़बान पर बार-बार दोहराया जाने वाला और क्या हो सकता है।
11
इश्क़ से बाज़ न आना 'हैदर'
राज़ होने दे अयाँ क्या होगा
ऐ हैदर, इश्क़ करने से पीछे मत हटो; अगर यह राज़ सब पर ज़ाहिर भी हो जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा?
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