“The way my heart tore into pieces all on its own; could even finest linen ever be rent asunder so?”
जिस तरह मेरा दिल अपने आप टुकड़े-टुकड़े हो गया, क्या उस तरह कभी कताँ (बारीक कपड़ा) भी फट सकता है?
उर्दू शायरी में यह मशहूर तशबीह है कि 'कताँ' (बेहद नफ़ीस और नाज़ुक कपड़ा) चाँदनी की ताब न ला कर ख़ुद-ब-ख़ुद फट जाता है। शायर इसी रवायत को सामने रखकर कहता है कि चाँदनी से कताँ भी क्या इतना तार-तार हुआ होगा, जितना मेरा दिल अपने ही अंदरूनी दर्द से टुकड़े-टुकड़े हो गया! यह उस ख़ामोश और गहरे सदमे की दास्तान है जहाँ इंसान बिना किसी ज़ाहिरी चोट के, अंदर ही अंदर पूरी तरह बिखर जाता है।
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