ग़ज़ल
सहर-ए-गह-ए-ईद में दौर-ए-सुबू था
सहर-ए-गह-ए-ईद में दौर-ए-सुबू था
यह ग़ज़ल ईद के सुबह के माहौल का वर्णन करती है, जहां एक ख़ास एहसास और यादों का दौर चल रहा है। शायर अपने दिल के उस कोने की बात करता है जो बेवजह गुज़र गया, और यह भी कहता है कि हर चीज़ में प्रिय का ही अक्स है।
गीत सुनें
1
सहर-ए-गह-ए-ईद में दौर-ए-सुबू था
पर अपने जाम में तुझ बिन लहू था
ईद के मैदान की सुबह में खुशियों का दौर था, पर अपने जाम में तुझ बिन सिर्फ़ खून था।
2
ग़लत था आप से ग़ाफ़िल गुज़रना
न समझे हम कि इस क़ालिब में तू था
आपसे बेपरवाह होकर गुज़रना गलत था, मुझे यह समझ नहीं आया कि आप इस साँचे में मौजूद हैं।
3
चमन की वज़' ने हम को क्या दाग़
कि हर ग़ुंचा दिल-ए-पुर-आरज़ू था
चमन की खुशबू ने हम पर क्या दाग़ लगाया, कि हर कली ही इच्छाओं से भरा दिल थी।
4
गुल-ओ-आईना क्या ख़ुरशीद-ओ-मह क्या
जिधर देखा तिधर तेरा ही रू था
गुलाब और आईना क्या, सूरज और चाँद क्या। जहाँ भी देखा, बस तेरा ही रूप था।
5
करोगे याद बातें तो कहोगे
कि कोई रफ़्ता-ए-बिसयार-गो था
अगर तुम यादों की बातें करोगे, तो कहोगे कि कोई बिसयार-गो (भूलने का) गहरा प्रवाह था।
6
जहाँ पर है फ़साने से हमारे
दिमाग़-ए-इश्क़ हम को भी कभू था
जहाँ से हमारी कहानियाँ बुनी गई हैं, वहाँ हमारे प्रेम के मन को भी कभी था।
7
मगर दीवाना था गुल भी किसू का
कि पैराहन में सो जागा रफ़ू था
अर्थ यह है कि गुलाब भी किसी के लिए दीवाना था, जिसके कारण उसकी खुशबू कपड़े में सो गई थी।
8
कहीं क्या बाल तेरे खुल गए थे
कि झोंका बाव का कुछ मुश्कबू था
कहीं क्या बाल तेरे खुल गए थे, कि झोंका बाव का कुछ मुश्कबू था। (अर्थ: तेरे बाल इतने खुल गए कि एक मामूली हवा का झोंका भी उन्हें छूने के लिए काफी था।)
9
न देखा 'मीर' आवारा को लेकिन
ग़ुबार इक ना-तवाँ सा कू-ब-कू था
मीर ने आवारा को नहीं देखा, लेकिन जगह-जगह धूल एक कमज़ोर नज़्म की तरह बिखरी हुई थी।
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