ग़ज़ल

न गया ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह जफ़ा-शआराँ

न गया ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह जफ़ा-शआराँ

कविता का सार है कि प्रिय के काले घुंघराले बालों का ख़्याल मन से नहीं गया, और यह विचार तब भी नहीं गया जब सुबह हो गई और रात का रोज़गार समाप्त हो गया। शायर कहता है कि उसने कभी नहीं कहा था कि तुम्हारे केश ढीले होंगे, और यह दिल कभी नहीं गया जो बेचैन है। जीवन में सुख-दुःख के पल आते-जाते हैं, और दुनिया में हर चीज़ बदल जाती है। अंत में, शायर कहता है कि उसकी आह और आँसू से सब कुछ ख़तरे में है, क्योंकि यह दुनिया पहले भी ऐसी ही रही है।

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लिपि व अर्थ
1
न गया ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह जफ़ा-शआराँ न हुआ कि सुब्ह होवे शब-ए-तीरा रोज़गाराँ
न गया तुम्हारे काले ज़ुल्फ़ का ख़्याल, ऐ शायर जफ़ा, और न हुआ कि सुबह हो गई, ऐ रोज़गार।
2
न कहा था ऐ रफ़ूगर तिरे टाँके होंगे ढीले न सिया गया ये आख़िर दिल-ए-चाक-ए-बे-क़राराँ
मैंने कभी नहीं कहा था ऐ रफ़ूगर कि तुम्हारे टाँके ढीले होंगे, न यह भी कहा कि यह दिल बे-क़राराँ है।
3
हुई ईद सब ने पहने तरब-ओ-ख़ुशी के जामे न हुआ कि हम भी बदलें ये लिबास-ए-सोगवाराँ
सबने खुशी और उत्साह के वस्त्र पहन लिए, लेकिन हमने यह घुमंतूओं का परिधान नहीं बदला।
4
ख़तर अज़ीम में हैं मिरी आह-ओ-अश्क से सब कि जहान रह चुका फिर जो यही है बाद-ओ-बाराँ
मेरी आहों और आँसुओं से सब में एक बड़ा ख़तरा है, क्योंकि दुनिया तूफ़ान और बवंडर के बाद भी वैसी ही रह गई है।
5
कहीं ख़ाक-ए-कू को उस की तू सबा न दीजो जुम्बिश कि भरे हैं इस ज़मीं में जिगर जिगर-फ़िगाराँ
कहीं ख़ाक-ए-कू को उस की तू सबा न दीजो जुम्बिश, कि भरे हैं इस ज़मीं में जिगर जिगर-फ़िगाराँ। (अर्थात, उस की समाधि के पास ऐसी हवा का झोंका न देना, कि धूल को भी हिला दे, क्योंकि यह ज़मीन जीवित लोगों के दिलों और रूपों से भरी हुई है।)
6
रखे ताज-ए-ज़र को सर पर चमन ज़माना में गिल न शगुफ़्ता हो तू इतना कि ख़िज़ाँ है ये बहाराँ
अपने सिर पर सोने का ताज रखना, ऐ ज़माना, और बगीचे के में ऐसा न होना कि तू इतना खिला न हो, कि ये पतझड़ ही बसंत हो।
7
नहीं तुझ को चश्म-ए-इबरत ये नुमूद में है वर्ना कि गए हैं ख़ाक में मिल कई तुझ से ताज-दाराँ
ये चश्म-ए-इबरत (दया की आँख) इस नज़ारे में नहीं है, वरना कई ताज-पहनने वाले लोग तुझसे मिलकर पहले ही धूल में मिल चुके होते।
8
तू जहाँ से दिल उठा याँ नहीं रस्म-ए-दर्दमंदी किसी ने भी यूँ न पूछा हुए ख़ाक याँ हज़ाराँ
हे शायर, तूने दिल कहाँ से उठाया, क्या दर्द की कोई रस्म है? किसी ने कभी धूल या हज़ारों से यूँ नहीं पूछा।
9
ये अजल से जी छुपाना मिरा आश्कार हैगा कि ख़राब होगा मुझ बिन ग़म-ए-इश्क़ गुल-अज़ाराँ
ये अजल से जीवन छिपाना मेरा ऐलान होगा, कि मेरे बिना प्रेम के बाग में ग़म होगा।
10
ये सुना था 'मीर' हम ने कि फ़साना ख़्वाब ला है तिरी सर-गुज़श्त सुन कर गए और ख़्वाब याराँ
ये सुना था 'मीर' हम ने कि फ़साना ख़्वाब ला है, पर तेरी सर-गुज़श्त सुन कर गए तो वो ख़्वाब ही निकले याराँ।
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