Sukhan AI
ग़ज़ल

कहीं पहुँचो भी मुझ बे-पा-ओ-सर तक

कहीं पहुँचो भी मुझ बे-पा-ओ-सर तक

यह ग़ज़ल प्रेम की गहराई और उसके अनुभवों की विडंबना को दर्शाती है। कवि कहता है कि वह प्रेमी के हर कोने तक पहुँचना चाहता है, जहाँ तक शमा जैसा दाग़ जिगर तक पहुँचा है, वहाँ तक भी। यह ग़ज़ल बताती है कि जिस चीज़ को कभी आग जैसा देखा था, वह सुबह होते ही राख हो जाती है, और चाँद जैसा मुख भी केवल रात के लिए है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
कहीं पहुँचो भी मुझ बे-पा-ओ-सर तक कि पहुँचा शम्अ-साँ दाग़ अब जिगर तक
कहीं तुम मुझ बे-पा-ओ-सर तक पहुँचो भी, तो भी यह जान लो कि शम्अ-साँ दाग़ अब जिगर तक पहुँच चुका है।
2
कुछ अपनी आँख में याँ का आया ख़ज़फ़ से ले के देखा दर-ए-तर तक
कुछ अपनी आँख में याँ का न आया, और ख़ज़फ़ से ले के देखा दर-ए-तर तक।
3
जिसे शब आग सा देखा सुलगते उसे फिर ख़ाक ही पाया सहर तक
जिसको रात में आग की तरह जलता हुआ देखा, उसे सुबह तक केवल राख ही मिली।
4
तिरा मुँह चाँद सा देखा है शायद कि अंजुम रहते हैं हर शब इधर तक
शायद आपने मेरे मुख को चाँद जैसा देखा होगा, जैसे कि हर रात तारे यहीं निवास करते हों।
5
जब आया आह तब अपने ही सर पर गया ये हाथ कब उस की कमर तक
जब आह आई तो वह अपने ही सिर पर पड़ी; यह हाथ कब उस की कमर तक पहुँचा।
6
हम आवाज़ों को सैर अब की मुबारक पर-ओ-बाल अपने भी ऐसे थे पर तक
शायर कहते हैं कि शहर की आवाज़ें अब घूमने लायक हैं, लेकिन उनके अपने बाल और दाढ़ी भी पहले कभी ऐसी ही थीं।
7
खिंची क्या क्या ख़राबी ज़ेर-ए-दीवार वले आया वो टक घर से दर तक
दीवार के नीचे क्या-क्या खराबी खींची गई, वह तो घर से लेकर दरवाज़े तक आया, बल्कि चौखट (अंगना) से भी नहीं आया।
8
गली तक तेरी लाया था हमें शौक़ कहाँ ताक़त कि अब फिर जाएँ घर तक
गली तक तेरी लाया था हमें शौक़, कहाँ ताक़त कि अब फिर जाएँ घर तक। (इसका अर्थ है कि हमें गली तक लाने में ही हमारा मन लगा था, अब घर तक जाने की शक्ति कहाँ है।)
9
यही दर्द-ए-जुदाई है जो इस शब तो आता है जिगर मिज़्गान-ए-तर तक
यह बिछड़ने का दर्द है जो आज रात हृदय के किनारे तक आता है, यह आत्मा के कक्ष के द्वार तक पहुँचता है।
10
दिखाई देंगे हम मय्यत के रंगों अगर रह जाएँगे जीते सहर तक
हम मय्यत के रंगों में दिखाई देंगे, यदि हम सहर (सुबह) तक जीवित रह पाए।
11
कहाँ फिर शोर शेवन जब गया 'मीर' ये हंगामा है इस ही नौहागर तक
कहाँ फिर शोर शेवन जब गया 'मीर', ये हंगामा है इस ही नौहागर तक। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जब शेवन का शोर कहीं चला गया, तो यह हंगामा केवल इसी शोक-भरे घर (नौहागर) तक सीमित है।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.