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खिंची क्या क्या ख़राबी ज़ेर-ए-दीवार वले आया वो टक घर से दर तक

What mischief, what trouble was dragged beneath the wall, He came, from home to door, not even from the hearth.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

दीवार के नीचे क्या-क्या खराबी खींची गई, वह तो घर से लेकर दरवाज़े तक आया, बल्कि चौखट (अंगना) से भी नहीं आया।

विस्तार

यह शेर उस दर्द को बयां करता है जब इंतज़ार बहुत ज़्यादा हो जाए। शायर पूछ रहे हैं कि दीवार के नीचे क्या-क्या ख़राबी छिपी है—यानी क्या-क्या राज़ दफ़न हैं। मगर दूसरी लाइन में एक कड़वा सच है: वो शख़्स कभी आया ही नहीं, न घर से, न दरवाज़े तक। यह ग़ज़ल बस ख़ामोशी और तन्हाई के उस एहसास को छूती है, जहाँ इंतज़ार का बोझ सबसे भारी होता है।

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